याद करें बीस साल पहले का चुनावी माहौल। कुछ तस्वीरें आंखों के सामने तैर जाएंगी। वो बिल्ले, जिसके छोटे-बड़े सभी दीवाने थे। लाउडस्पीकर लगी गलियों की खाक छानती वो गाड़ियां याद आई होंगी। वह दौर था जब घरों पर लगे झंडे बता देते थे कि हवा का रुख किधर का है। पर, आज माहौल बदल गया है। सड़कों पर चुनाव का शोर कम हो गया है। चुनावी खुमारी में डूबे कार्यकर्ताओं की संख्या घट गई है। ऐसे में सोशल मीडिया जन-जन तक अपनी बात पहुंचाने का सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। अब प्रचार जमीन से ज्यादा आभासी मंच पर हो रहा है।
तमाम पाबंदियां भी वर्चुअल प्लेटफाॅर्म पर सक्रियता की बड़ी वजह : चुनाव को लेकर आयोग की ओर से जनसभा, पदयात्रा, साइकिल रैली, बाइक रैली व रोड शो की पैनी निगरानी की जा रही है। हर खर्च का रेट फिक्स है, जिसमें कोई हेरफेर नहीं कर सकते। इससे बचने के लिए भी प्रत्याशियों ने सोशल मीडिया पर अपनी ताकत झोंक दी है। हालांकि, आयोग ने सोशल मीडिया के लिए भी आचार संहिता लागू की है। पर, आज भी सोशल मीडिया प्रचार के बाजार में 70 फीसदी असंगठित क्षेत्र हावी है। सिंगल मैन शो वाले एक्सपर्ट की भरमार है और भारी मांग भी है। इसलिए प्रत्याशी जो खर्च का ब्योरा दे वही मानना होगा।
महज 20 फीसदी ही बचा कारोबार 30 साल से प्रचार सामग्री के कारोबार में हूं। दस साल पहले तक खासा काम था। चार लोगों के स्टाफ को बढ़ाकर 15 करना पड़ता था। छह लोगों का काम तो केवल दिल्ली से माल लाना होता था। पांच-पांच प्रेस को एक साथ ऑर्डर देते थे। दो महीने तो रात-दिन काम चलता था। एक चुनाव साल-दो साल का खर्च निकाल देता था। पर, अब महज 20 फीसदी काम बचा है।
-सुशील वर्मा, थोक प्रचार सामग्री विक्रेता
जितना क्रिएटिव, उतनी कीमत दस साल पहले ब्लाॅगर से काॅमर्शियल कंटेंट राइटर बना। अब अपनी कंपनी खोल ली है। 31 प्रत्याशियों की सोशल मीडिया हैंडलिंग कर रहे हैं। इस प्लेटफॉर्म पर आप जितना क्रिएटिव होंगे, उतना ही मुंहमांगा दाम मिलेगा। फीस नहीं बता सकता, लेकिन इतना जरूर संकेत दे सकता हूं कि सालभर का खर्च और मुनाफा इस चुनाव से निकल जाएगा।