चव्हाण से भाजपा को फायदा होगा
लेकिन कितना, यह भाजपा नहीं आंक पा रही है। इस बार चव्हाण खुद चुनाव मैदान में नहीं हैं, लेकिन नतीजे उनका भविष्य तय करेंगे। जिस तरह से भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को खुद जूझना पड़ा है और केवल मोदी के नाम पर ही वोट मांगे जा रहे हैं, उसके बाद भाजपा की जीत यहां अब मोदी की जीत होगी और हार होने पर चव्हाण की चूक मानी जाएगी।
मराठवाड़ा, खासकर नांदेड़ में चव्हाण परिवार की खासी पैठ है। अशोक चव्हाण के पिता शंकर राव चव्हाण मराठों के दिग्गज नेता रहे हैं। अशोक की भी वैसी ही पकड़ रही। यही वजह है कि 2014 की मोदी लहर में भी वह जीत गए थे। अब भाजपा के साथ हैं, तो पार्टी की उम्मीदें बढ़ी हैं। मोदी ने रैली में शंकर राव चव्हाण से बहुत पहले हुई मुलाकात का जिक्र कर फख्र से कहा कि आज उनका परिवार हमारे साथ है। बड़े साहब के जिक्र से चव्हाण समर्थक गदगद हैं। लेकिन, गोदावरी नदी के किनारे इस क्षेत्र में इस बार बयार किस ओर बहेगी.. इस पर सबकी नजरें हैं।
भाजपा जीत दोहराकर कांग्रेस का गढ़ तोड़ना चाहती है। पिछले आठ चुनावों में यहां भाजपा केवल दो ही बार जीती है-2004 व 2019 में। इस बार प्रतापराव गोविंदराव चिखलीकर भाजपा, एनसीपी (अजित पवार) और शिवसेना (शिंदे) गठबंधन महायुति के प्रत्याशी हैं, तो कांग्रेस ने पूर्व विधायक वसंतराव चव्हाण को उतारा है। विकास बहुजन आघाड़ी (वीबीए) के अविनाश बोसिकर इस बार गणित बिगाड़ने की स्थिति में नहीं हैं।
कांग्रेस कार्यकर्ता अचंभित हैं कि अशोक चव्हाण ने अचानक पार्टी क्यों छोड़ दी। नायगांव के कांग्रेस समर्थक सुमित्र कहते हैं, हमारा उम्मीदवार (अशोक चव्हाण) तो भाजपा में चला गया। अब सोचना पड़ेगा, हमें क्या करना है। कांग्रेस उम्मीदवार वसंतराव चव्हाण कहते हैं कि मेरी लड़ाई अशोक चव्हाण से है, न कि भाजपा उम्मीदवार प्रतापराव से। वसंत मानते हैं कि अगर प्रतापराव के लिए अशोक मैदान में न होते तो उनकी लड़ाई आसान थी। भाजपा को कुछ मुद्दे परेशान कर रहे हैं। पिछले दो हफ्तों में, विभिन्न गांवों में मराठा कार्यकर्ताओं द्वारा भाजपा नेताओं को प्रवेश करने से रोका गया है। मुखेड़ क्षेत्र के जांब गांव की तरह कई जगह एक मराठा, लाख मराठा के नारे लगे। रैली में पीएम मोदी ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा लेकिन मंच से मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को कहना पड़ा कि उनकी सरकार ने ही दस फीसदी आरक्षण दिया है।
दलों को उलझा रहे जातीय समीकरण
मराठों का विरोध कितना होगा, इस पर काफी कुछ इसलिए निर्भर करेगा, क्योंकि करीब साढ़े 18 लाख मतदाताओं वाले नांदेड़ में 6.5 लाख मराठा मतदाता हैं। चव्हाण के पारंपरिक समर्थक रहे मुसलमानों के रुख का पता नहीं चलता है। प्राचार्य व राजनीतिक विशेषज्ञ डॉ. शेखर कहते हैं, चव्हाण के शामिल होने से साढ़े चार लाख से अधिक मुस्लिम और दलित वोटं क्या भाजपा की ओर रुख करेंगे, यह कहना मुश्किल है।
■ भाजपा आश्वस्त है कि उसका अपना वोट बैंक तो है ही, अशोक के साथ उनके वोट बैंक का 15 प्रतिशत भी आएगा, तो सीट आसानी से निकल जाएगी। नांदेड़ में लगभग 1.75 लाख लिंगायत वोट हैं। लोकसभा चुनावों में ज्यादातर ये वोट भाजपा के पक्ष में जाते रहे हैं। हालांकि, वीबीए ने बोसिकर को उतारकर लिंगायत वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की है।
मुद्दों की बात
भाजपा अनुच्छेद-370, राममंदिर और तीन तलाक को भुनाने की कोशिश में है, लेकिन असर स्थानीय मुद्दों का भी कम नहीं। मराठा आरक्षण तो है ही, किसानों से जुड़े मुद्दे भी हैं। नांदेड़ से केले का निर्यात किया जाता है, लेकिन कपास व गन्ने के उचित दाम नहीं मिलने से किसान परेशान हैं। तेलंगाना की सीमा से सटे देगलूर के रेस्टोरेंट संचालक अमित ग्रंथमवार कहते हैं, यहां और उस ओर (तेलंगाना) की सड़क देख लें, पता चल जाएगा कि कितना विकास हुआ है। प्रचार चरम पर है, लेकिन सड़कों-गलियों से ज्यादा मोबाइल फोन पर...।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019
| उम्मीदवार |
दल |
मत |
मत% |
| प्रतापराव चिखलीकर |
भाजपा |
4.87 लाख |
43.10 |
| अशोक चव्हाण |
कांग्रेस |
4.47 लाख |
39.55 |
| प्रो. यशपाल भिंगे |
वीबीए |
1.66 लाख |
14.72 |
2014
| उम्मीदवार |
दल |
मत |
मत% |
| अशोक चव्हाण |
कांग्रेस |
4.93 लाख |
48.62 |
| दिगंबर पाटिल |
भाजपा |
4.12 लाख |
40.59 |
सिख और सियासी महत्व
सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह नांदेड़ में ज्योति जोत में समाये थे। यहां स्थित गुरुद्वारा सचखंड और तख्त श्री हजूर साहिब में हर साल लाखों श्रद्धालु आते हैं। यहां सिख वोटरों की संख्या 15 हजार के करीब है। इन्हें ध्यान में रखकर ही मोदी ने रैली में अपनी सरकार की ओर से किए काम गिनाने में कांग्रेसी मनमोहन सरकार कसर नहीं छोड़ी और कांग्रेस को उनका दुश्मन बताया। दूसरी ओर के समय गुरुता गद्दी दिवस के लिए जारी हुए तीन हजार करोड़ रुपये की बात करते हैं।