कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के दामाद राधाकृष्ण डोड्डामणि दशकों तक कर्नाटक में उनके राजनीतिक व वित्तीय मामले संभालने के बाद अब ससुर की संसदीय सीट वापस दिलाने चुनाव मैदान में हैं। कांग्रेस ने उन्हें खरगे की परंपरागत सीट गुलबर्गा (कलबुर्गी) से उतारा है। 1952 से अब तक कांग्रेस यह सीट सिर्फ तीन बार हारी है। 2019 में खरगे ने अपने 60 साल के सियासी सफर में पहली बार इसी सीट से चुनावी हार का सामना किया था। भाजपा के उमेश जाधव ने 95,000 से अधिक मतों के अंतर से उन्हें मात दी थी।
राधाकृष्ण स्थानीय राजनीति में कांग्रेस के कान माने जाते हैं और क्षेत्र में उनका व्यापक अनुभव उनके लिए बड़ी ताकत है। वर्ष 1999 से 2004 के बीच कर्नाटक में एसएम कृष्णा के नेतृत्व वाली तत्कालीन कांग्रेस सरकार के दौरान केवल दो ही दामादों की चर्चा थी। कृष्णा के दामाद वीजी सिद्धार्थ और दूसरे थे खरगे के दामाद डोड्डामणि। डोड्डामणि पर्दे के पीछे काम करने वाले नेता हैं। वह खरगे के चुनावी अभियानों का प्रबंधन और रणनीति बनाने के लिए पर्दे के पीछे से काम करते रहे हैं।
राधाकृष्ण डोड्डामणि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। गुरमिटकल विधानसभा सीट पर डोड्डामणि की अच्छी पकड़ है। पहले चर्चा थी कि खरगे के बेटे प्रियांक को टिकट मिल सकता है, लेकिन उनके इन्कार के बाद डोड्डामणि को मौका मिला।
मिलनसार...जनता के लिए सदैव मौजूद
डोड्डामणि का मिलनसार स्वभाव और जनता के लिए सदैव उपलब्ध रहना उन्हें खास बनाता है। वह संवाद में अच्छे हैं। उनके पास गुरमिटकल में चुनाव और प्रबंधन का व्यापक अनुभव है। डोड्डामणि शिक्षा के व्यवसाय में हैं। वह बंगलूरू में डॉ. बीआर अंबेडकर मेडिकल कॉलेज के ट्रस्टी भी हैं। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलता है कि वह ग्रेविटास इन्वेस्टमेंट्स, ग्रेविटास एस्टेट्स, ट्रिपल-जेम पॉलीसैक्स और आरके पॉलीसैक्स सहित कई कंपनियों के निदेशक हैं।
पिछड़े समुदायों के बीच खाई पाटना होगा कड़ी चुनौती
डोड्डामणि के सामने खरगे परिवार और क्षेत्र के कई पिछड़े समुदायों के बीच की खाई को पाटना सबसे अहम चुनौती होगी। भले ही थोड़े गैर-दलित समुदाय के नेता 2019 के बाद कांग्रेस में लौटे हैं लेकिन अभी भी कुछ तनावपूर्ण रिश्ते हैं।