गुजरात में शायद भाजपा के संस्कार, परंपरा और इतिहास में पहली बार हुआ है कि किसी प्रत्याशी के नाम की घोषणा होने के बाद उसे बदलना पड़ा। सीट है वडोदरा, जो राज्य में भाजपा की सबसे सुरक्षित सीट मानी जाती है। कहा जाता है यहां किसी को भी भाजपा के टिकट पर खड़ा कर दिया जाए जीतना पक्का है।
वडोदरा लोकसभा सीट पर 1998 से लगातार भाजपा जीत रही है। 26 साल से सांसद भाजपा का है। रंजनबेन भट्ट दो बार से सांसद हैं। वह जब पहली बार चुनाव जीतीं, तो उनकी जीत का अंतर गांधीनगर सीट पर अमित शाह की जीत से भी ज्यादा था। रंजनबेन 5.79 लाख वोट से जीतीं थीं। 1991 में रामायण धारावाहिक में सीता का किरदार निभाने वाली दीपिका चिखलिया यहां से भाजपा के टिकट पर सांसद बनी थीं। तीन बार बड़ौदा के शाही परिवार गायकवाड़ घराने के तीन सदस्य भी यहां से संसद पहुंच चुके हैं। वडोदरा लोकसभा सीट में सात विधानसभा सीटें आती हैं। ये हैं सयाजीगंज, वाघोडिया, रावपुरा, मांजलपुर, सावली, अकोटा और वडोदरा। सातों पर भाजपा के विधायक हैं। वडोदरा गुजरात का तीसरा सबसे ज्यादा आबादी वाला शहर है। इस बार 14 उम्मीदवार मैदान में हैं। भाजपा से डॉ. हेमांग जोशी और कांग्रेस से जसपाल सिंह मुकाबला करेंगे। यहां तीसरे चरण में सात मई को मतदान होगा।
हेमांग गुजरात के सबसे युवा उम्मीदवार हैं। उम्र 33 साल है। मौजूदा सांसद रंजनबेन भट्ट की उम्र 61 साल है। पिछली बार से आधी उम्र के उम्मीदवार को टिकट देकर भाजपा ने पीढ़ी परिवर्तन का कार्ड भी खेला है। हेमांग को टिकट मिलने की भी कहानी रोचक है। वह बताते हैं कि होली के बाद पत्नी के साथ किसी कार्यक्रम में गए थे, जब उन्हें फोन पर बधाइयां मिलने लगीं। उन्हें भरोसा नहीं हुआ। अभी साढ़े तीन साल पहले ही उन्होंने पार्टी ज्वॉइन की है। इतने छोटे राजनीतिक कॅरिअर में देश की सबसे बड़ी पार्टी से सांसद का टिकट मिल जाने पर हैरान होना लाजिमी है। भाजपा नेता और वडोदरा प्रवक्ता संजीव भाई कहते हैं, हेमांग के लिए चुनाव इसलिए आसान होंगे, क्योंकि उनकी स्लेट साफ है। अभी उस पर कुछ अच्छा-बुरा नहीं लिखा है। हेमांग भाजपा की शिक्षण समिति के अध्यक्ष थे। नगर पालिका के स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम की कक्षा शुरू करवाने का श्रेय उन्हें जाता है। वह कवि और फिजियोथेरैपिस्ट हैं। मैनेजमेंट में पीएचडी की है। टिकट मिलने से पहले तक एचआर मैनेजर की नौकरी कर रहे थे।
हेमांग के सामने कांग्रेस ने क्षत्रिय उम्मीदवार उतारा है। नाम है जसपाल सिंह पढियार। उम्मीद लगाई जा रही है कि राज्य में चल रहे क्षत्रिय विवाद का थोड़ा फायदा कांग्रेस को मिलेगा। वैसे तो पढियार तीन महीने पहले कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति के चलते जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा तक दे चुके हैं। यहां एक लाख क्षत्रिय वोटर हैं, जो जीत-हार के अंतर पर असर डाल सकते हैं। हालांकि वोटिंग का रुझान देखें तो यहां कभी जाति आधारित मतदान नहीं होता। वडोदरा न क्लास देखकर, न कास्ट और न ही कैटेगरी देखकर वोट डालता है। बड़ौदा घराने के आलीशान जय विलास पैलेस में गार्ड मनसुख भाई कहते हैं, भाजपा किसी को भी टिकट दे, वह जीत जाएगा। बड़ौदा भाजपा की नक्की सीट है।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019
उम्मीदवार पार्टी मत%
रंजनबेन भट्ट भाजपा 72.22
प्रशांत पटेल कांग्रेस 24.07
2014
नरेंद्र मोदी भाजपा 72.75
मधुसूदन मिस्त्री कांग्रेस 23.69
(नरेंद्र मोदी काशी से भी जीते थे। बाद में वडोदरा सीट छोड़ दी थी।)
चार कारण...क्यों कम हो सकता है जीत का अंतर
- रंजनबेन को लेकर हुआ विवाद भाजपा के जीत के अंतर पर असर डाल सकता है। रंजनबेन को भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण टिकट छोड़ना पड़ा। पूर्व मेयर ने ही उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। शहर में रंजनबेन के खिलाफ पोस्टर लगवा दिए गए थे। विवाद इतना बढ़ा कि भाजपा ने टिकट तो दिया, पर बाद में रंजनबेन को व्यक्तिगत कारणों का बहाना बनाकर लौटाना पड़ा। बता दें कि पिछले चुनाव में दिए पांच साल पहले के हलफनामे के मुताबिक रंजनबेन की संपत्ति 300 प्रतिशत बढ़ गई थी।
- मौसम इस बार उम्मीदवारों का इतना साथ नहीं देगा, जितना हमेशा देता रहा है। यहां पारा लगातार 41 के पार है। लू, भीषण गर्मी का सबसे ज्यादा नुकसान यह है कि वह सियासी पारा ऊपर चढ़ने नहीं देता।
- भाजपा के कार्यकर्ता उस जोश के साथ प्रचार में शामिल नहीं हो रहे हैं, जो पहले के चुनावों तक होते थे। इसकी वजह ये भी है कि वे न तो रंजनबेन की उम्मीदवारी से खुश थे और न ही हेमांग जोशी की।
- क्षत्रिय विवाद खत्म नहीं हुआ है। वे 5% वोटर जो ऐन वक्त पर तय करते हैं कि वोट किसे देना है, वे इस विवाद के चलते भाजपा का अंतर कम कर सकते हैं। कांग्रेस के क्षत्रिय प्रत्याशी को इसका फायदा हो सकता है।