सांगली सीट 19 में से 16 बार कांग्रेस जीती है। 2014 में पहली बार भाजपा के काका ने वसंतदादा पाटिल के नाती प्रतीक पाटिल को हराया था। 2019 में यह सीट कांग्रेस के सहयोगी दल स्वाभिमानी शेतकरी (किसान) संगठन के खाते में गई थी, जिस पर बसंतदादा के घराने के विशाल पाटिल ने काका को कड़ी चुनौती दी थी। इस बार राजनीतिक समीकरण कुछ इस तरह बने हैं कि लड़ाई भाजपा बनाम एमवीए नहीं, बल्कि भाजपा बनाम निर्दलीय हो गई है।
स्थानीय गुटों का खेल
सांगली में तीन पाटिलों की लड़ाई है। भाजपा का अपना मजबूत संगठन है। आरएसएस की ताकत है। छह विधानसभाओं में से तीन पर भाजपा के विधायक हैं। चंद्रहार पाटिल कहते हैं कि सांगली अब कांग्रेस का गढ़ नहीं रहा। हालांकि, विशाल पाटिल कांग्रेस की विरासत के सहारे ही चुनाव लड़ रहे हैं। सांगली की हर तालुका, विधानसभाओं में तीन से पांच गुट हैं, जो स्थानीय राजनीति में दबदबा रखते हैं। इन गुटों के लोग किसी पार्टी नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति, सत्ता का गणित और अर्थनीति के तहत अपनी भूमिका बदलते हैं।
पिछले दो चुनावों का हाल
2019
उम्मीदवार दल मत%
संजय पाटिल भाजपा 52.77
विशाल पाटिल कांग्रेस 28.96
2014
संजय पाटिल भाजपा 58.38
प्रतीक पाटिल कांग्रेस 35.52