आपातकाल के बाद 1977 में पहली बार गैर-कांग्रेसी जनता सरकार का गठन हो रहा था। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर अपनी जीवनी जीवन जैसा जिया में लिखते हैं, मोरारजी देसाई उनको सरकार में अनमने ढंग से शामिल करने का मन बना चुके थे। पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुए। जब मोरारजी का चंद्रशेखर के पास फोन आया, तो उन्होंने अपनी जगह इंदिरा सरकार में शहरी विकास मंत्री रह चुके मोहन धारिया का नाम आगे बढ़ा दिया। धारिया को इंदिरा ने अपनी कैबिनेट से बड़ी बेरुखी से बर्खास्त किया था। उससे वह बहुत अपमानित महसूस कर रहे थे। ऐसे में वह चंद्रशेखर के पास खुद ही अपने नाम की सिफारिश लेकर गए थे। उनकी बात पर चंद्रशेखर ने कहा कि मोरारजी भाई ने बात तो नहीं की है, लेकिन जब वह मंत्री पद ऑफर करेंगे तो मैं जरूर आपका नाम लूंगा। इधर, चंद्रशेखर के मना करते ही मोरारजी ने राहत की सांस ली। जब यह बात जेपी को पता चली, तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उनके सचिव ने चंद्रशेखर को फोन कर कहा कि मोरारजी ने आपको मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया। इससे जेपी बहुत दुखी हैं। इस पर चंद्रशेखर ने कहा कि उन्होंने खुद ही मंत्री बनने से इन्कार किया है, बाकी बातें आकर करेंगे। अगले दिन चंद्रशेखर जेपी से मिले। उन्हें याद दिलाया कि प्रधानमंत्री पद के लिए जब आपने मुझसे पूछा था, तो मैंने खुद मोरारजी भाई का विरोध किया था। ऐसे में भला उनकी सरकार में कैसे शामिल होता। दरअसल जेपी ने चंद्रशेखर से पूछा था कि पीएम किसे बनाना चाहिए, तो उन्होंने कहा था, किसी को भी बनाइए, लेकिन मोरारजी को नहीं।