छत्तीसगढ़ में आदिवासी इलाकों में पकड़ ढीली पड़ने के बाद कांग्रेस 23 फीसदी आदिवासी आबादी वाले पड़ोसी राज्य ओडिशा में भी आदिवासियों से दूर होती दिख रही है। कभी इन इलाकों में लंबे समय तक काबिज रही कांग्रेस लगातार कमजोर होने और भाजपा की पैठ बढ़ने के बाद अब सत्ताधारी क्षेत्रीय दल बीजद से सीधी टक्कर भी नहीं ले पा रही है। कभी बीजद के सामने कांग्रेस थी। अब उसकी जगह भाजपा ने ले ली है। यही कारण है कि ओडिशा में बीजद और भाजपा अलग-अलग समय पर एक-दूसरे के पक्ष और विरोध में खड़े दिखते हैं।
वैसे तो ओडिशा के सभी जिलों में आदिवासियों की अच्छी संख्या है, लेकिन आदिवासियों की कुल आबादी का आधे से अधिक हिस्सा तीन जिलों कोरापुट, सुंदरगढ़ और मयूरभंज में है। कंधमाल और बलांगीर में भी आदिवासियों की आबादी चुनाव को प्रभावित करती है। सुंदरगढ़ व मयूरभंज में कांग्रेस लगभग समाप्त है। मयूरभंज देश की पहली आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का गृह जनपद है। कांग्रेस को मजबूत करने के लिए प्रदेश अध्यक्ष शरत पटनायक भी विस चुनाव लड़ रहे हैं।
कंधमाल और बलांगीर में भी आदिवासियों की आबादी चुनाव को करती है प्रभावित
मयूरभंज में तीसरे से पहले स्थान पर पहुंची भाजपा
बीते तीन चुनाव के नतीजे देखें तो पाएंगे कि कैसे आदिवासी बहुल सीटों पर भाजपा ने बढ़त बनाई है। 2009 में मयूरभंज से सांसदी चुनाव में बीजद प्रत्याशी विजयी रहे थे। भाजपा तब तीसरे स्थान पर थी और झारखंड से लगी इस सीट पर झामुमो दूसरे स्थान पर थी। 2014 में बीजद ने चुनाव जीता, भाजपा दूसरे स्थान पर पहुंच गई। 2019 में इस सीट पर भाजपा ने कब्जा कर लिया और विश्वेश्वर टुड्डू सांसद चुने गए।
इन सीटों पर भी पिछड़ी, भाजपा ने बनाई बढ़त
कंधमाल, बलांगीर और अस्का लोकसभा क्षेत्रों में भी लंबे समय से कांग्रेस मुकाबले से दूर है। 2019 में कंधमाल सीट पर बीजद ने जीत दर्ज की और भाजपा दूसरे स्थान पर रही। अस्का में भी बीजद ने जीत दर्ज की और भाजपा दूसरे स्थान पर रही।
वापसी की उम्मीद
कांग्रेस को इस चुनाव में वापसी की उम्मीद है। प्रदेश कांग्रेस प्रभारी ओजय कुमार कहते हैं, ऐसा नहीं है कि हम अपनी जमीन खो रहे हैं। समय बदल रहा है। इस चुनाव के नतीजे बताएंगे। कांग्रेस आदिवासी इलाकों में भी बेहतर प्रदर्शन करने जा रही है।
सुंदरगढ़ में धीरे-धीरे जमीन खोती गई कांग्रेस
सुंदरगढ़ लोकसभा क्षेत्र में कभी कांग्रेस का एकछत्र राज था। 1996 तक दबदबा दिखाने वाली कांग्रेस धीरे-धीरे जमीन खोती चली गई और भाजपा अपनी जड़ें मजबूत करती गई। आदिवासियों ने अपने नेता के तौर पर भाजपा के जुएल उरांव को पांच बार संसद चुनकर भेजा, तो पार्टी ने भी उन्हें आदिवासी मामलों का मंत्रालय गठित कर उपहार दिया। 2009 में कांग्रेस जुएल उरांव को हराकर लौटी जरूर, लेकिन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में वहां बीजद भाजपा के सीधे मुकाबले में आ गई।