यूपी के बरेली के काका जोगिंदर सिंह 350 से भी अधिक बार चुनाव लड़ चुके हैं...पार्षद से लेकर राष्ट्रपति तक, पर कभी जीत नसीब नहीं हुई। उन्होंने कभी वोट तक नहीं मांगा। वह वोटरों से कहते थे-मेहरबानी करके मुझे वोट देकर अपना मत बर्बाद न करना। काका जोगिंदर सिंह तो अब नहीं हैं, लेकिन चुनाव आते हैं तो काका लोगों को याद आने लगते हैं। हारने के बाद काका लोगों को खुशी से मेवा और मिश्री खिलाकर मुंह भी मीठा करवाते थे।
नागरमल बाजौरिया...सियासत के धरतीपकड़, हार के बाद अगले चुनाव की तैयारी
धरतीपकड़ के नाम से मशहूर भागलपुर, बिहार के नागरमल बाजौरिया 282 से भी अधिक बार चुनाव लड़ चुके हैं। कभी जीते नहीं, पर हार से दुखी नहीं हुए। हर हार के बाद अगले चुनाव की तैयारी में जुट जाते। कहते थे, लोकतंत्र में आम आदमी की अहमियत को बताने और उसे साबित करने के लिए ही चुनाव लड़ता हूं। जीत-हार की मेरी जिंदगी अहमियत नहीं है।
विजय प्रकाश कोंडेकर, जूते को जिताएं
महाराष्ट्र के विजय प्रकाश कोंडेकर 1980 तक बिजली विभाग में काम करते थे। वे 28 बार चुनाव लड़ चुके हैं। उन्हें अक्सर पुणे में साइनबोर्ड लगी स्टील की एक गाड़ी धकेलते देखा जा सकता है। इस बोर्ड पर जूते को जिताएं लिखा रहता है। यह उनका चुनाव चिह्न है। उन्हें देखकर अक्सर लोग सेल्फी लेने लगते हैं।
अटल, राव, मनमोहन तक को चुनौती, के. पद्मराजन परमानंद तोलानी शंकर लाल नरवान
तमिलनाडु के के. पद्मराजन 237 बार चुनाव लड़ चुके हैं और सभी में हारे। वह पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी, पीवी नरसिंह राव, मनमोहन सिंह के खिलाफ भी लड़ चुके हैं। राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़े। मध्यप्रदेश के परमानंद तोलानी 18 बार लड़े, पर जीत नसीब नहीं हुई। रियल एस्टेट कारोबारी तोलानी का परिवार दो पीढ़ियों से चुनाव लड़ने के लिए मशहूर है। हर बार इसके सदस्यों की जमानत जब्त हुई है। राजस्थान के शंकरलाल 38 साल में 26 से अधिक बार चुनाव लड़ चुके हैं। उन्होंने पंचायत, नगरपालिका से लेकर संसदीय चुनाव लड़ा, पर कभी जीते नहीं।