पूर्णिया लोकसभा सीट
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“यह कोई एक व्यक्ति का चुनाव नहीं है। यह दो धारा, या तो एनडीए या तो इंडिया, या तो एनडीए और या तो इंडिया की लड़ाई है। या तो आप इंडिया को चुनो, और अगर इंडिया को नहीं चुन सकते बीमा भारती को तो फिर एनडीए को चुन लीजिए। साफ बात है।”
तेजस्वी यादव का यह बयान इन दिनों सुर्खियों में है। पूर्णिया लोकसभा सीट के राजद प्रत्याशी बीमा भारती के लिए वोट मांगने गए तेजस्वी ने जनसभा में यह बात कही। तेजस्वी के इस बयान के कई मायने निकाले जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक तेजस्वी की इस अपील को पप्पू यादव से जोड़कर देख रहें हैं। जो पूर्णिया सीट से निर्दलीय ताल ठोंक रहे हैं।
हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी पूर्णिया सीट की बात करेंगे। इसके चुनावी इतिहास की बात करेंगे। बात करेंगे यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ था? इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी जानेंगे…
पहले पूर्णिया सीट के बारे में
बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से एक पूर्णिया भी है। पूर्णिया नाम से लोकसभा सीट 1957 में अस्तित्व में आई थी। साल 1951-52 में देश के पहले आम चुनाव हुए तब पूर्णिया नाम से लोकसभा सीट नहीं थी। साल 1957 में हुए दूसरे आम चुनाव में पूर्णिया सीट अस्तित्व में आई। इस चुनाव में कांग्रेस के फणि गोपाल सेन गुप्ता को जीत मिली। उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार बालकृष्ण गुप्ता को 43,537 वोट से शिकस्त दी थी। 1962 में लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस के फणि गोपाल सेन गुप्ता जीते। इस बार उन्होंने स्वतंत्र पार्टी के प्रत्याशी बिशेश्वर नारायण शर्मा को 69,791 वोट से हराया।
1967 के लोकसभा चुनाव में भी पूर्णिया सीट पर कांग्रेस को सफलता मिली। कांग्रेस के फणि गोपाल सेन गुप्ता ने यहां से जीत की हैट्रिक लगाई। इस बार उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के बी. गुप्ता को 4,620 वोट से हराया।
1971 में लोकसभा चुनाव में पूर्णिया सीट पर कांग्रेस का चेहरा बदल चुका था। इस चुनाव में पार्टी के उम्मीदवार मोहम्मद ताहिर थे। चुनाव में ताहिर ने भाकपा की तरफ से उतरे जेडए अहमद को 20,164 वोटों से हराया।
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में कांग्रेस हारी
साल 1977, आपातकाल के बाद देश में चुनाव होते हैं। पूर्णिया से भारतीय लोकदल के टिकट पर मैदान में उतरे लखन लाल कपूर ने जीत दर्ज की। उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार माधुरी सिंह को 92,037 वोट से शिकस्त दी।
तीन साल बाद 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए। 1980 के चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार माधुरी सिंह ने अपनी पिछली हार का बदला ले लिया। माधुरी ने जनता पार्टी (सेकुलर) के उम्मीदवार नियानन्द आर्य को 61,956 वोटों से हराकर सफलता अर्जित की।
1984 के लोकसभा चुनाव में यहां से कांग्रेस की उम्मीदवार माधुरी सिंह फिर से जीतने में सफल रहीं। सहानुभूति लहर पर सवार होकर आई कांग्रेस को पूर्णिया में 1,90,400 वोटों की बड़ी जीत मिली। इस चुनाव में कांग्रेस की माधुरी ने लोक दल की तरफ से उतरे कमलनाथ झा को शिकस्त दी।
1989 के लोकसभा चुनाव में पूर्णिया सीट पर जनता दल ने अपना झंडा फहराया। जनता दल के टिकट पर उतरे तस्लीमुद्दीन ने माकपा उम्मीदवार अजित सरकार को 54,557 मतों से हराया।
पूर्णिया सीट पर पप्पू यादव की एंट्री
दो साल बाद 1991 के लोकसभा चुनाव होते हैं। पूर्णिया लोकसभा सीट पर चुनाव में धांधली के आरोपों के कारण चुनाव रद्द कर दिया गया। इसके बाद हुए चुनाव में निर्दलीय पप्पू यादव यहां से जीतकर लोकसभा पहुंचे।
1996 का लोकसभा चुनाव में पप्पू यादव समाजवादी पार्टी की तरफ से उम्मीदवार होते हैं। राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव इस बार भारतीय जनता पार्टी से राजेंद्र गुप्ता को 3,16,155 मतों से विशाल अंतर से शिकस्त दी।
1998 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पूर्णिया सीट पर अपना खाता खोला। पार्टी के उम्मीदवार जय कृष्ण मंडल ने इस बार सपा के पप्पू यादव को 35,817 वोटों से हरा दिया।
1999 के चुनाव में पूर्णिया सीट पर पप्पू यादव सपा उम्मीदवार के तौर पर नहीं बल्कि निर्दलीय चुनाव मैदान में होते हैं। पिछली हार को भुलाते हुए पप्पू इस बार जबरदस्त वापसी करते हैं। 1999 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने भाजपा के जय कृष्ण मंडल को 2,52,566 वोटों के बड़े अंतर से हराकर अपनी पिछली हार का बदला ले लिया। यह पप्पू यादव की पूर्णिया सीट पर तीसरी जीत थी।
भाजपा की ओर से पप्पू सिंह को मिली जीत
साल 2004, इस बार पप्पू यादव लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरते हैं। इस बार उनके सामने भाजपा से उदय सिंह थे। इस चुनाव में भाजपा प्रत्याशी उदय सिंह ने पप्पू यादव को एक कड़े मुकाबले में 12,883 वोटों से हरा दिया।
अब आती है 2009 के लोकसभा चुनाव की बारी। इस चुनाव में भाजपा की ओर से उतरे उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह ने पूर्णिया सीट पर जीत हासिल की। उदय ने निर्दलीय उम्मीदवार शांति प्रिया को 1,86,227 वोट से हराया।
2014 में पप्पू यादव पूर्णिया की बजाय मधेपुरा से लड़े
अब बारी थी 2014 के लोकसभा चुनाव की, देश के ज्यादातर हिस्सों में भाजपा को जीत मिलती है। हालांकि, पूर्णिया में पार्टी जदयू के सामने हार जाती है। जदयू लोकसभा चुनाव से कुछ समय पहले ही एनडीए से अलग हुई थी। इस चुनाव में पप्पू यादव ने पूर्णिया की बजाय मधेपुरा सीट से राजद के टिकट पर अपनी किस्मत आजमाई और सफलता भी हासिल की।
वहीं पूर्णिया सीट पर जदयू के संतोष कुमार कुशवाहा को विजय मिली। उन्होंने भाजपा उम्मीदवार उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह को 1,16,669 वोटों से शिकस्त दी। जदयू उम्मीदवार को 3,55,120 वोट मिले। वहीं, भाजपा के प्रत्याशी को 3,02,157 वोट मिले।
2019 में जदयू को मिली सफलता
2019 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने बिहार की 40 में से 39 सीटों पर जीत हासिल की। इनमें पूर्णिया की जीत भी शामिल रही। इस चुनाव में पूर्णिया सीट पर जदयू के संतोष कुमार कुशवाहा ने कांग्रेस के टिकट पर उतरे उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह को 2,63,461 वोटों से हराया। इस चुनाव में जदयू प्रत्याशी को 6,32,924 वोट मिले। वहीं, कांग्रेस के उम्मीदवार को 3,69,463 वोट मिले।
निर्दलीय उम्मीदवार पप्पू यादव
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इस बार का मुकाबला हुआ दिलचस्प
अब बात 2024 के चुनाव की कर लेते हैं। इस बार एनडीए के प्रत्याशी के तौर पर जदयू से मौजूदा सांसद संतोष कुमार कुशवाहा चुनाव मैदान में हैं। वहीं, राजद की तरफ से पूर्व विधायक बीमा भारती उम्मीदवार हैं। रुपौली से विधायक रहीं बीमा हाल में जदयू से इस्तीफा देकर राजद में आई थीं।
इसके अलावा पूर्व सांसद पप्पू यादव ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में नामांकन किया है, जिससे पूर्णिया सीट का मुकाबला दिलचस्प हो गया है। पप्पू यादव कांग्रेस के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ना चाहते थे लेकिन महागठबंधन में बात नहीं बनी। इसी प्रयास में कुछ दिन पहले पूर्व सांसद ने अपनी पार्टी जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) का कांग्रेस में विलय भी किया था। राजद ने यहां बीमा भारती को टिकट देकर पप्पू यादव के प्रयासों पर विराम लगा दिया। अंततः पप्पू यादव निर्दलीय ही चुनाव मैदान में उतर गए हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि पूर्णिया की जनता किसके पक्ष में मतदान करती है और किसे अपना जनप्रतिनिधि चुनती है।