लखनऊ लोकसभा सीट
- फोटो : AMAR UJALA
उत्तर प्रदेश लोकसभा में सबसे ज्यादा 80 सांसद भेजता है। यहां की कई सीटों के मुकाबले दिलचस्प होते हैं। ऐसी ही एक सीट है लखनऊ लोकसभा सीट। बीते कई चुनावों से यह देश की सबसे चर्चित सीटों में शामिल रही है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी लगातार पांच बार यहां से सांसद रहे। यहां के मौजूदा सांसद देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह हैं। राजनाथ सिंह को एक बार फिर भाजपा ने अपना उम्मीदवार बनाया है। वहीं, सपा ने रविदास मेहरोत्रा को अपना प्रत्याशी है।
हमारे विशेष कार्यक्रम ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी लखनऊ सीट की बात करेंगे। राजनाथ सिंह से पहले इस सीट का प्रतिनिधित्व कौन-कौन से चेहरे कर चुके हैं? लखनऊ सीट का चुनावी इतिहास क्या है? इस सीट पर कब किसे जीत मिली? 2019 के चुनाव में राजनाथ की जीत कितनी बड़ी थी? मौजूदा सियासी समीकरण क्या कहता है? आइये इन सभी सवालों के जवाब जानते हैं…
1952 और 1953 में नेहरू परिवार से संबंध रखने वाले उम्मीदवार जीते
लखनऊ के चुनावी इतिहास की ओर गौर करें तो पहले आम चुनाव में लखनऊ नाम से लोकसभा सीट का अस्तित्व नहीं था। 1951-52 में जब देश के पहले लोकसभा चुनाव हुए, उस वक्त उत्तर प्रदेश में लखनऊ जिला- बाराबंकी जिला और लखनऊ जिला मध्य नाम से दो सीटें थीं। लखनऊ जिला मध्य सीट से कांग्रेस की विजय लक्ष्मी पंडित जीती थीं। विजय लक्ष्मी देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु की बहन थीं। वहीं, लखनऊ जिला- बाराबंकी जिला सीट से कांग्रेस की गंगा देवी को जीत मिली थी।
1953 में विजय लक्ष्मी पंडित के इस्तीफा देने के बाद लखनऊ जिला मध्य सीट पर उप चुनाव हुए थे। 1954 में हुए इस उप-चुनाव में नेहरू परिवार से संबंध रखने वालीं श्योराजवती नेहरू जीतीं थीं। श्योराजवती की शादी डॉक्टर किशन लाल नेहरू से हुई थी। श्योराजवती का नाम याद रखिएगा।
अटल बिहारी वाजपेयी
- फोटो : BJP
लखनऊ के चुनावी रण में उतरे अटल, लेकिन मिली हार
साल 1957, देश में दूसरी बार लोकसभा चुनाव हुए। इसी चुनाव में लखनऊ लोकसभा सीट अस्तित्व में आई। मुकाबला भले ही पहला था लेकिन दिलचस्प रहा। भारतीय जनसंघ की टिकट पर अटल बिहारी वाजपेयी उतरे तो कांग्रेस ने पुलिन बिहारी बनर्जी को उम्मीदवार बनाया। नतीजे सामने आए तो अटल को 12,485 वोटों से हार का सामना करना पड़ा।
1962 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने लखनऊ सीट बरकरार रखी। यहां एक बार फिर जन संघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को हार का सामना करना पड़ा। इस बार कांग्रेस के बीके धवन ने अटल को 30,017 वोट से हराया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज को मिली जीत
1967 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई। इस चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार आनंद नारायण मुल्ला ने कांग्रेस के वीआर मोहन को 20,972 मतों से हरा दिया। राजनीति में आने से पहले आनंद नारायण एक वकील और इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज की जिम्मेदारी निभा चुके थे। आनंद नारायण मुल्ला के पिता पंडित जगत नारायण मुल्ला थे। कश्मीरी पंडित परिवार से ताल्कुल रखने वाले पंडित जगत नारायण मुल्ला आजादी से पहले उत्तर प्रदेश जिसे उस वक्त यूनाइटेड प्रोविंस कहा जाता था के एक प्रमुख वकील थे। उन्होंने कई मामलों में उस वक्त की अंग्रेज सरकार का भी पक्ष रखा था। मशहूर काकोरी कांड में भी जगत नारायण मुल्ला अंग्रेजों के वकील थे। मोती लाल नेहरू के करीबी जगत नारायण की बेटी श्योराजवती की शादी नेहरू परिवार से संबंध रखने वाले किशन लाल नेहरू से हुई थी। वही, श्योराजवती जो 1954 के उप-चुनाव में कांग्रेस के टिकट जीतीं थीं। उन्ही श्योराजवती के भाई आनंद नारायण लखनऊ सीट पर कांग्रेस की पहली हार का कारण बने थे। आनंद नारायण उस दौर के चर्चित उर्दू कवि थे। उन्होंने कई किताबें लिखीं थीं। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित आनंद नारायण बाद में कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा भी गए।
गांधी-नेहरू परिवार से ताल्लुक रखने वाली शीला जीतीं
1971 के लोकसभा चुनाव जब इस सीट से कांग्रेस ने गांधी-नेहरू परिवार से संबंध रखने वाली शीला कौल को अपना उम्मीदवार बनाया। शीला कौल के पति कमला नेहरू के भाई थे। यानी, शीला कौल इंदिरा गांधी की मामी थीं। 1971 में शीला ने जनसंघ के पुरषोत्तम दास कपूर को 1,19,201 वोटों से हराया था। ये वही शीला कौल थीं जो बाद में रायबरेली से भी जीतकर लोकसभा पहुंचीं।
आपातकाल के बाद हुए 1977 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को देश के ज्यादातर हिस्सों में हार झेलनी पड़ी। लखनऊ सीट पर भी यही हाल हुआ। 1977 में यहां से भारतीय लोकदल के नेता हेमवती नंदन बहुगुणा ने कांग्रेस की शीला कौल को 1,65,345 वोटों के बड़े अंतर से हरा दिया। हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। बहुगुणा की बेटी रीता बहुगुणा जोशी लखनऊ जिले की लखनऊ कैंट विधानसभा सीट से 2012 में कांग्रेस और 2017 में भाजपा के टिकट पर जीती थीं। फिलहाल रीता इलहाबाद लोकसभा सीट से सांसद हैं।
कांग्रेस ने फिर वापसी की
1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने एक बार फिर से वापसी कर ली। पार्टी की प्रत्याशी शीला कौल ने जनता पार्टी के महमूद बट को 30,382 मतों से शिकस्त दी।
1984 में हुए चुनाव में भी कांग्रेस की तरफ से उतरीं शीला कौल जीतीं। इस बार उन्होंने लोक दल के उम्मीदवार मोहम्मद यूनुस सलीम को 1,22,120 मतों के बड़े अंतर से परास्त किया।
1989 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ सीट कांग्रेस के हाथ से निकल गई। इस चुनाव में जनता दल के मांधाता सिंह ने जीत अर्जित की, जिन्होंने कांग्रेस के दाऊजी को 15,296 को मतों से हराया। ये वही चुनाव था जब कांग्रेस ने शीला कौल को लखनऊ की जगह रायबरेली से मैदान में उतारा था। शीला 1989 में रायबरेली से भी जीतने में सफल रहीं थीं। इसके बाद 1991 में भी शीला रायबरेली से जीतकर संसद पहुंचीं थीं।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी
- फोटो : सोशल मीडिया
तीसरे प्रयास में लखनऊ से जीते अटल
यह साल था 1991 के लोकसभा चुनाव का। इस चुनाव में लखनऊ लोकसभा सीट का मुकाबला सुर्खियों में रहा। इस बार के चुनावी रण में भारतीय जनता पार्टी दस्तक देती है और चेहरे के रूप में पेश करती है अटल बिहारी वाजपेयी को। 29 साल बाद लखनऊ की सियासत में अटल वापसी करते हैं। इससे पहले वह 1957 और 1962 में जनसंघ की टिकट पर यहां से चुनाव लड़ चुके होते हैं। तब दोनों बार अटल को हार का सामना करना पड़ा था। 1991 के लोकसभा चुनाव में दिग्गज भाजपा नेता ने अपनी पिछली दो हार का बदला ले लिया। इस चुनाव में उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार रंजीत सिंह 1,17,303 वोटों के बड़े अंतर से हराया।
2004 तक अटल बिहारी ही जीते
1996 के लोकसभा चुनाव में भी लखनऊ सीट का मुकाबला सुर्खियों में रहा। भारतीय जनता पार्टी के तरफ से एक बार फिर से तत्कालीन सांसद अटल बिहारी वाजपेयी तो समाजवादी पार्टी ने अभिनेता राज बब्बर चुनाव में उतरते हैं। नतीजे एक बार फिर से भाजपा के पक्ष में होते हैं।
इस चुनाव में इस चुनाव में अटल ने राज बब्बर को 1,17,303 वोटों के बड़े अंतर से हराया। इस जीत के साथ 16 मई 1996 को अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं। हालांकि, महज 13 दिनों में ही उनकी सरकार गिर जाती है। दो साल के भीतर देश को दो और प्रधानमंत्री मिलते हैं, लेकिन लोकसभा का कार्यकाल पूरा नहीं हो पाता। 1998 आते-आते नए सिरे से चुनाव की नौबत आ जाती है।
1998 के चुनाव में भी लखनऊ सीट से भाजपा के सबसे बड़े चेहरे और तत्कालीन सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ही उतरते हैं। जीत दर्ज करते हैं और जीत की हैट्रिक लगाते हैं। 1998 में वाजपेयी ने सपा की तरफ से उतरे मुजफ्फर अली को 2,16,263 वोट के विशाल अंतर से मात दी। चुनाव के बाद एक बार फिर अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हैं। इस बार 13 महीने तक सरकार चलाते हैं। 13 महीने बाद अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिर जाती है। नए सिरे से चुनाव होते हैं।
1999 में हुए इन चुनावों में भी लखनऊ से अटल बिहारी वाजपेयी ही भाजपा के उम्मीदवार होते हैं। लगातार चौथी बार अटल बिहारी को यहां से जीत मिलती है। इस बार उन्होंने कांग्रेस के डॉ. कर्ण सिंह को 1,23,624 वोट से हराया। इस जीत के बाद 13 अक्तूबर 1999 को अटल बिहारी वाजपेयी तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेते हैं।
2004 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ सीट से लगातार पांचवीं बार जीतते हैं। इस चुनाव में उन्होंने सपा की मधु गुप्ता को 2,18,375 मतों से हराया था।
लालजी टंडन
- फोटो : Amar Ujala
लालजी टंडन ने रीता बहुगुणा को हराया
2009 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ से भाजपा ने वरिष्ठ नेता लालजी टंडन को उतारा। इस चुनाव में टंडन ने कांग्रेस की तरफ से उतरीं रीता बहुगुणा जोशी को 40,901 वोट से शिकस्त दी। ये इस सीट पर भाजपा की लगातार छठी जीत थी।
राजनाथ सिंह
- फोटो : ANI
2104 और 2019 में राजनाथ को बड़ी जीत मिली
अब आता है 2014 का लोकसभा चुनाव, जब उत्तर प्रदेश की 80 में से 71 सीटों पर भाजपा को जीत मिली। इन 71 सीटों में से एक सीट लखनऊ भी थी। भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह इस सीट से चुनाव मैदान में उतरे थे। उन्होंने सपा की तरफ से उतरीं रीता बहुगुणा जोशी को 2,72,749 वोट के बड़े अंतर से परास्त किया।
2019 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा की तरफ से राजनाथ सिंह उम्मीदवार थे। वहीं, सपा ने अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी और अभिनेत्री पूनम सिन्हा को मैदान में उतारा। इस चुनाव में राजनाथ सिंह को जीत मिली। उन्होंने सपा उम्मीदवार को 3,47,302 वोटों से हराया। यहां कांग्रेस ने आचार्य प्रमोद कृष्णम को उतारा था, जो तीसरे स्थान पर रहे।
2024 लोकसभा चुनाव में मुकाबला
अब बात 2024 के लोकसभा चुनाव की कर लेते हैं। इस चुनाव में भाजपा ने लगातार तीसरी बार राजनाथ सिंह को टिकट दिया है। बीते आठ चुनाव से लखनऊ सीट पर जीत दर्ज कर रही भाजपा के राजनाथ सिंह का मुकाबला इस बार सपा के रविदास मेहरोत्रा से होगा। लखनऊ लोकसभा सीट के तहत पांच विधानसभाएं आती हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ लोकसभा में पड़ने वाली पांच में से तीन विधानसभा सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। वहीं, दो सीटों पर सपा के उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी।