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Chunavi Kisse: जब इंदिरा ने बनाया प्याज को चुनावी मुद्दा, महज तीन साल में पूरी तरह बदल गई थी देश की सियासी हवा

जयदेव सिंह
Updated Tue, 14 May 2024 05:49 AM IST

सार

Chunavi Kisse: देश में पहली बार मध्यावधि चुनाव 1980 में हुए थे। पहली बार 1980 में ही प्याज चुनावी मुद्दा बना था। प्याज के साथ शक्कर और तेल के दाम भी मुद्दा बने थे। इंदिरा की पार्टी को 353 सीटों पर सफलता मिली थी। आज के चुनावी किस्से में बात 1980 के लोकसभा चुनाव की...
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इंदिरा गांधी - फोटो : AMAR UJALA
आज के चुनावी किस्से में बात उस लोकसभा चुनाव की जब देश में पहली बार मध्यावधि चुनाव हुए। वो चुनाव जो सत्ता पक्ष में काबिज पार्टी के बहुमत खोने की वजह से हुए। आज बात 1980 के लोकसभा चुनाव की। 1977 में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई जनता पार्टी से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं। केंद्र में सरकार बदलने के बाद कई राज्यों की सरकारें बर्खास्त कर दी गईं। इन राज्यों में नए सिरे से चुनाव हुए। कुछ राज्यों को छोड़कर ज्यादातर राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी जनता पार्टी को भारी सफलता मिली। जनता बेहद कौतूहल से जनता पार्टी की सरकार की ओर देख रही थी। लेकिन, सत्ता में आने बाद इस दल के लिए कई चुनौतियां सामने आने लगीं। कई दलों को मिलाकर बने इस दल के नेता अलग-अलग विचारधारा के थे। अलग-अलग मुद्दों पर उनकी अलग-अलग राय होती थी। यही आगे टकराव की वजह बनने लगी। धीरे-धीरे ये टकराव बढ़ने लगे।

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इंदिरा गांधी - फोटो : AMAR UJALA
आज के चुनावी किस्से में बात उस लोकसभा चुनाव की जब देश में पहली बार मध्यावधि चुनाव हुए। वो चुनाव जो सत्ता पक्ष में काबिज पार्टी के बहुमत खोने की वजह से हुए। आज बात 1980 के लोकसभा चुनाव की। 1977 में प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई जनता पार्टी से लोगों को बहुत उम्मीदें थीं। केंद्र में सरकार बदलने के बाद कई राज्यों की सरकारें बर्खास्त कर दी गईं। इन राज्यों में नए सिरे से चुनाव हुए। कुछ राज्यों को छोड़कर ज्यादातर राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी जनता पार्टी को भारी सफलता मिली। जनता बेहद कौतूहल से जनता पार्टी की सरकार की ओर देख रही थी। लेकिन, सत्ता में आने बाद इस दल के लिए कई चुनौतियां सामने आने लगीं। कई दलों को मिलाकर बने इस दल के नेता अलग-अलग विचारधारा के थे। अलग-अलग मुद्दों पर उनकी अलग-अलग राय होती थी। यही आगे टकराव की वजह बनने लगी। धीरे-धीरे ये टकराव बढ़ने लगे।

पहला मध्यावधि चुनाव और इंदिरा का बेलछी दौरा
वहीं, दूसरी ओर देश के अलग-अलग हिस्सों में जातीय हिंसा की घटनाएं बढ़ने लगीं। महाराष्ट्र से लेकर बिहार तक में इस तरह की जातीय हिंसा की घटनाएं बढ़ रही थीं। ऐसी ही एक घटना बिहार के बेलछी में हुई। इस हिंसा में नौ लोगों को जिंदा जला दिया गया। मामले की जानकारी मिलते ही इंदिरा गांधी बेलछी गांव पहुंच गईं। उस वक्त रात हो चली थी, लेकिन इंदिरा के इरादे नहीं डिगे। हवाई जहाज से दिल्ली-पटना का सफर करने वाली इंदिरा बिहार शरीफ तक कार से गई थीं, लेकिन बेलछी में उन्हें सवारी के लिए हाथी मिला और इंदिरा हाथी पर सवार हो गईं। उनका रात में हाथी पर बैठकर बेलछी गांव पहुंचना देश और दुनिया भर की मीडिया की सुर्खियां बन गया।

इंदिरा के विरोधी रहे मधु लिमिये ने 'जनता पार्टी एक्सपेरिमेंट: एन इनसाईडर अकाउंट ऑफ अपोजीशन पॉलिटिक्स' में लिखा कि बेलछी की यात्रा ने इंदिरा को फिर से भारतीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। उनकी इस यात्रा ने कई उद्देश्यों को एक साथ पूरा कर दिया। इसके साथ ही जनता सरकार के उस दावे को भी कमजोर किया कि वह गरीबों और हरिजनों की हितैशी है। बल्कि इंदिरा की यात्रा ने उनकी छवि को गरीब और हरिजन हितैशी बना दिया।

1980 के चुनावों में महंगाई बनी मुद्दा
एक तरफ देश में बढ़ती जातीय हिंसा से जनता सरकार की लोकप्रियता घट रही थी, दूसरी तरफ बेकाबू होती महंगाई ने भी सरकार की मुश्किलों को बढ़ा रखा था। 1980 के चुनावों में महंगाई कितना बड़ा मुद्दा बन गई थी इसका अंदाजा इस चुनावी नारे से लगाया जा सकता है, जिसमें कहा जाता था, जनता पार्टी हो गई फेल, खा गई चीनी, पी गई तेल। 

इसी तरह 1978 में इंदिरा गांधी को गिरफ्तार करने का जनता सरकार का फैसला भी उनके खिलाफ गया। जिस तरह से इंदिरा को बेइज्जत किया गया उससे भी उन्हें जनता की सहानभूति मिली। इन सबके बीच पार्टी के नेताओं की आपसी खींचतान से सरकार में संघर्ष जारी था। मोरारजी सरकार बनने के महज दो साल बाद ही जनता पार्टी बिखर गई। पार्टी में दो धड़े हो गए। चौधरी चरण सिंह का समाजवादी धड़ा पार्टी से अलग हो गया। जिन इंदिरा गांधी का विरोध करके जनता पार्टी सत्ता में आई थीं उन्हीं के समर्थन से चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। महज एक महीने बाद इंदिरा ने चरण सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया और इसके साथ ही नए सिरे से चुनाव तय हो गए।

जनता पार्टी की आपसी लड़ाई का फायदा में कांग्रेस को हुआ
राष्ट्रपति ने एक महीने तक अन्य दलों को सरकार बनाने के लिए बहुमत जुटाने का समय दिया, लेकिन कोई भी समाधान नहीं होने की स्थिति में चुनाव आयोग को नए सिरे से मध्यावधि चुनाव कराने के लिए कहा गया। चुनाव आयोग को प्रक्रिया के लिए दो महीने का वक्त लगा। तब तक चौधरी चरण सिंह अपने पद पर रहे। 1980 में जनता पार्टी से अलग हुए चरण सिंह की पार्टी और जनता पार्टी आमने-सामने थे। जनता पार्टी की आपसी लड़ाई का फायदा इस चुनाव में कांग्रेस को हुआ। इंदिरा की पार्टी को 353 सीटें मिलीं। जो 1971 में कांग्रेस को मिली सफलता से भी ज्यादा थीं। वहीं, जनता पार्टी को 31 तो चरण सिंह की जनता पार्टी (सेक्युलर) को 41 सीटों से संतोष करना पड़ा। 

इंदिरा की पार्टी को दक्षिण में अच्छी सफलता मिली। वहीं, उत्तर में जनता पार्टी के दोनों धड़ों की लड़ाई का उन्हें उत्तर में फायदा हुआ। खासतौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां तीन साल पहले पार्टी का सूपड़ा साफ हो गया था। बिहार में कांग्रेस 45 में से 30 सीटें जीतने में सफल रही तो उत्तर प्रदेश में उसे 85 में से 51 सीटों पर जीत मिली। बिहार में कांग्रेस को 36 फीसदी वोट मिले तो उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस को 35.9 फीसदी वोट मिले।

दिलचस्प था रायबरेली सीट का मुकाबला 
वहीं, जनता पार्टी के दोनों धड़ों को मिलाकर वोट ज्यादा मिले पर पार्टी में हुए बंटवारे का सीटों के लिहाज से बहुत नुकसान हुआ। जनता पार्टी की सरकार चलाने की विफलता को भी इंदिरा की पार्टी ने जमकर चुनावी मुद्दा बनाया था। चुनाव में कांग्रेस के नारे- चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकें- ने भी चुनाव नतीजों पर असर डाला था। इसी तरह महंगाई भी इस चुनाव में बड़ा मुद्दा थी। पहली बार 1980 में ही प्याज चुनावी मुद्दा बना था। प्याज के साथ शक्कर और तेल के दाम भी मुद्दा बने थे। कांग्रेस ने चुनाव के दौरान महंगाई के तुलनात्मक आंकड़े तक पेश किए। इसमें प्याज, तेल और शक्कर के रेट बताए गए थे।

इस चुनाव के सबसे चर्चित मुकाबलों की बात करें तो उनमें रायबरेली लोकसभा सीट का मुकाबला सबसे दिलचस्प था। यहां से इंदिरा गांधी के खिलाफ जनता पार्टी ने राजमाता विजयराजे सिंधिया को अपना उम्मीदवार बनाया था। नतीजे आए तो इंदिरा ने यहां से बहुत बड़ी जीत दर्ज की। इंदिरा रायबरेली के साथ आंध्र प्रदेश की मेंडक लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतरीं थी। उन्हें यहां भी जीत मिली।
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