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Chunavi Kisse: क्यों अलग-अलग होने लगे लोकसभा और विधानसभा के चुनाव, इंदिरा ने कैसे दिया 'गरीबी हटाओ' का नारा?

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Tue, 09 Apr 2024 10:09 AM IST

सार

Chunavi Kisse: आज के 'चुनावी किस्से' में बात उस चुनाव की करेंगे जब पहली बार लोकसभा चुनाव अलग से कराया गया। इससे पहले अधिकांश राज्यों के विधानसभा चुनाव भी लोकसभा चुनाव के साथ ही होते थे। 
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इंदिरा गांधी - फोटो : AMAR UJALA
बीते कुछ वक्त से अक्सर एक देश एक चुनाव की चर्चा होती रहती है। इसे लेकर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में एक कमेटी भी बनाई गई। कमेटी ने बीते महीने अपनी रिपोर्ट भी राष्ट्रपति को सौंप दी। 191 दिनों में तैयार 18,626 पन्नों की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2029 से देश में पहले चरण लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं। इसके बाद 100 दिनों के भीतर दूसरे चरण में स्थानीय निकाय के चुनाव कराए जा सकते हैं। 

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इंदिरा गांधी - फोटो : AMAR UJALA
बीते कुछ वक्त से अक्सर एक देश एक चुनाव की चर्चा होती रहती है। इसे लेकर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में एक कमेटी भी बनाई गई। कमेटी ने बीते महीने अपनी रिपोर्ट भी राष्ट्रपति को सौंप दी। 191 दिनों में तैयार 18,626 पन्नों की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि 2029 से देश में पहले चरण लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं। इसके बाद 100 दिनों के भीतर दूसरे चरण में स्थानीय निकाय के चुनाव कराए जा सकते हैं। 

जब लोकसभा चुनाव राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ नहीं हुए
आज के चुनावी किस्से में बात उस चुनाव की करेंगे जब पहली बार लोकसभा चुनाव अलग से कराया गया। इससे पहले अधिकांश राज्यों के विधानसभा चुनाव भी लोकसभा चुनाव के साथ ही होते थे। बात, 1971 की है। केंद्र में इंदिरा गांधी की सरकार थी। इंदिरा अपनी ही पार्टी से बगावत करके कांग्रेस के दो टुकड़े कर चुकी थीं। चुनाव में 14 महीने का वक्त बचा था। इंदिरा की नई पार्टी कांग्रेस (आर) नए सिरे से बहुमत हासिल करके अपने प्रगतिशील सुधारों को लागू करना चाहती थी। वो सुधार जिन्हें कांग्रेस के ओल्ड गार्ड्स की वजह से इंदिरा अब तक लागू नहीं कर सकी थीं। इसके लिए इंदिरा और उनकी पार्टी ने वक्त से पहले चुनावों में जाने का फैसला लिया।
 
इसके साथ ही यह तय हो गया कि लोकसभा चुनाव राज्यों के विधानसभा चुनाव के साथ नहीं होंगे। इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर नेहरू' में लिखते हैं कि समय से पहले आम चुनाव करवाकर प्रधानमंत्री ने बड़ी चतुराई से अपने आपको विधानसभा चुनावों से अलग कर लिया था। दोनों चुनाव साथ-साथ होने की स्थिति में जाति और नस्लीयता की भावना राष्ट्रीय मुद्दों को प्रभावित कर देती थी। 1967 के चुनावों में कांग्रेस को इससे बहुत नुकसान हुआ था। खासतौर पर तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र और ओडिशा जैसे राज्यों में स्थानीय मुद्दों ने बहुत असर डाला था। इस बार इंदिरा ने तय किया कि पहले आम चुनाव करवाकर वो इन दोनों ही मुद्दों को अलग कर देंगी और जनता से राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर सीधा समर्थन मांगेंगी।
 

इंदिरा के खिलाफ बना महागठबंधन 
वहीं, दूसरी ओर कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं के धड़े से बनी कांग्रेस (ओ) ने जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, समाजवादी और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर इंदिरा के खिलाफ एक महागठबंधन बनाया। इस महागठबंधन ने इंदिरा के खिलाफ अभियान चलाया। इसी दौरान विपक्ष की ओर से इंदिरा हटाओ का नारा गढ़ा गया। इस नारे को इंदिरा की कांग्रेस ने अपने पक्ष में मोड़ लिया। विपक्ष के नारे के जवाब में इंदिरा ने कहा कि वे कहते हैं इंदिरा हटाओ, हम कहते हैं गरीबी हटाओ। कांग्रेस का ‘गरीबी हटाओ’ का नारा जनता में चल गया। 

इंदिरा ने 58 हजार किमी से ज्यादा की यात्रा की
इस नारे के जरिए कांग्रेस ने खुद को प्रगतिशील बताया जबकि विपक्ष को प्रतिक्रियावादी ताकतों का गठजोड़ बताया गया। चुनाव को व्यक्ति केंद्रित बना देने से विपक्ष को फायदे के बजाय नुकसान ही हुआ। दूसरी तरफ इंदिरा ने सत्ताधारी पार्टी के चुनाव प्रचार की कमान पूरी तरह से अपने हाथ में ले ली। दिसंबर 1970 में लोकसभा भंग होने के बाद से चुनाव तक इंदिरा ने 10 हफ्ते में 58 हजार किमी से ज्यादा की यात्रा की। इस दौरान उन्होंने 300 से ज्यादा चुनावी रैलियों को संबोधित किया। करीब दो करोड़ लोगों ने उनका भाषण सुना। उस दौर में इंदिरा के इस चुनाव प्रचार, इंदिरा की सियासी स्थिति की तुलना 1952 के पंडित जवाहर लाल नेहरू के चुनाव प्रचार और सियासी हालात से की गई।  

अपने भाषणों में इंदिरा गांधी ने अपनी नई पार्टी और पुरानी पार्टी के फर्क को खुलकर जनता के सामने रखा। इंदिरा इन भाषणों में यह संदेश देती थीं ‘पुरानी कांग्रेस’ रूढ़िवादी और निहित स्वार्थी के हाथों की कठपुतली थी जबकि ‘नई कांग्रेस’ गरीबों के हितों के प्रति समर्पित थी। इंदिरा की नई पार्टी की सांगठनिक कमजोरी को युवा कार्यकर्ताओं के उत्साह ने दूर कर दिया, जिन्होंने देशभर में घूम-घूम कर अपने नेता के संदेश को फैलाया। मतदान के दिन, मतदान केंद्रों पर उमड़ी भारी भीड़ ने साफ कर दिया कि लोग तकलीफों से छुटकारा पाने के लिए नई उम्मीदों से लबरेज हैं। 

ओल्ड गार्ड्स की कांग्रेस को जनता ने पूरी तरह से नकारा
जब नतीजे सामने आए तो 518 सीटों में से कांग्रेस (आर) को 352 सीटों पर जीत हासिल हुई जबकि दूसरे नंबर पर आने वाली सीपीएम को महज 25 सीटें ही मिल पाईं। एक और वामपंथी पार्टी सीपीआई को 23 सीटें तो जनसंघ को 22 सीटों पर जीत मिली। वहीं, विपक्षी गठबंधन में सबसे ज्यादा 238 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस (ओ) को महज 16 सीटों से संतोष करना पड़ा। इन नतीजों ने साफ कर दिया कि जनता ने पुरानी रुढ़िवादी सोच वाली ओल्ड गार्ड्स की कांग्रेस को पूरी तरह से नकार दिया। जीत के भारी अंतर ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इंदिरा गांधी की कांग्रेस ही असली कांग्रेस है। नतीजों के विजेता और पराजित होने वाले, दोनों ने ही स्वीकार किया कि यह एक ही व्यक्ति की जीत थी। वो शख्सियत थीं इंदिरा गांधी। 

1952 से कांग्रेस दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिह्न के साथ चुनाव में उतरी रही थी। 1971 के चुनाव में कांग्रेस में हुई टूट के बाद इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) गाय और बछड़ा चुनाव चिह्न के साथ मैदान में उतरी थी। 1971 के लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज करने वाली इंदिरा गांधी की कांग्रेस (आर) आगे चलकर कांग्रेस (आई) बनी और पार्टी का चुनाव चिह्न हाथ का पंजा हो गया। और फिर कांग्रेस (आई) से ये आई भी हट गया। कांग्रेस (आर) के कांग्रेस (आई) और फिर कांग्रेस बनने का किस्सा फिर कभी। आज के चुनावी किस्से में इतना ही।
 
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