पूर्णिया क्षेत्र का सियासी समीकरण क्या है?
बिहार के पूर्णिया प्रमंडल में चार जिले- अररिया, कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया जिले आते हैं। इनमें कुल 24 सीटें हैं। इनमें सबसे ज्यादा सात-सात सीटें कटिहार और पूर्णिया जिले में आती हैं। अररिया जिले में छह तो किशनगंज में चार सीटें हैं।
2020 में कैसे रहे थे नतीजे?
2020 के विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के बीच में था। 243 सदस्यीय विधानसभा में एनडीए ने 125 सीटें जीतीं थीं। इनमें सबसे ज्यादा 74 सीटें भाजपा के खाते में गई थीं। जदयू को 43, वीआईपी और हम को 4-4 सीट पर सफलता मिली थी। राज्य की 110 सीटें महागठबंधन के खाते में गई थीं। 75 सीटें जीतकर राजद राज्य की सबसे बड़ा दल बना था। इसके साथ ही कांग्रेस को 19, वामदलों को 16 सीट पर जीत मिली थी। इनमें 12 सीटें भाकपा (माले) और दो-दो सीटें भाकपा और माकपा के खाते में गईं थी। अन्य दलों की बात करें तो एआईएमआईएम ने पांच, बसपा, लोजपा और निर्दलीय को एक-एक सीट पर जीत मिली थी।
2020 में पूर्णिया प्रमंडल में किसे मिली थी बढ़त?
2020 के विधानसभा चुनाव में पूर्णिया प्रमंडल की 12 सीटों पर एनडीए को जीत मिली थी। वहीं, महागठबंधन को सात सीट से संतोष करना पड़ा था। एआईएमआईएम ने इस इलाके में बड़ी सेंध लगाई और पांच सीटों पर जीत दर्ज की। दलवार आंकड़ों की बात करें को भाजपा को आठ और जदयू को चार सीटें मिली। महागठबंधन में कांग्रेस को पांच, राजद और भाकपा (माले) को एक-एक मिली थी।
2015 में कैसे थे नतीजे?
प्रदेश में 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में एनडीए और महागठबंधन के बीच में मुकाबला हुआ। इस चुनाव में महागठबंधन में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी भी शामिल थी। जदयू के अलावा राजद और कांग्रेस ने साथ मिलकर यह चुनाव लड़ा। वहीं, एनडीए में भाजपा के साथ लोजपा, जीतन राम मांझी की हम और उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा शामिल थे।
इस चुनाव में महागठबंधन ने 178 सीटों पर जीत दर्ज की थी। वहीं, एनडीए को 58 सीटों से संतोष करना पड़ा था। वाम दलों के खाते में तीन सीटें गईं थी। दलवार आंकडे़ की बात करें तो राजद को सबसे ज्यादा 80 सीटें मिली थीं। जदयू के खाते में 71 और कांग्रेस को 27 सीटों पर सफलता मिली थी। एनडीए में सबसे ज्यादा 53 सीटों पर भाजपा को जीत मिली थी। लोजपा और रालोसपा को दो-दो और हम को एक सीट जीतने में सफलता मिली थी। वाम दलों में तीनों सीटें भाकपा (माले) ने जीती थीं। बाकी चार सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवार जीतने में सफल रहे थे।
2015 में पूर्णिया प्रमंडल के नतीजे कैसे रहे?
2015 के चुनाव में राजद-जदयू और कांग्रेस के साथ आने की वजह से एनडीए इस इलाके में काफी नुकसान हुआ। एनडीए में केवल भाजपा को ही सफलता मिली। यहां उसने छह सीटें जीती थीं। महागठबंधन ने इस इलाके में बड़ी जीत दर्ज करते हुए 17 सीटों पर कब्जा जमाया। एक सीट भाकपा(माले) के खाते में गई। महागठबंधन के दलवार आंकड़ों की बात करें तो कांग्रेस आठ, राजद तीन और जदयू छह सीटें जीतने में सफल रहा था।
2010 में कैसे थे नतीजे?
2008 में परिसीमन के बाद यहां 2010 में पहली बार चुनाव हुए थे। इस चुनाव में एकतरफा एनडीए को जीत मिली थी। एनडीए में जदयू और भाजपा ने एक साथ चुनाव लड़ा था। वहीं राजद और लोजपा साथ थे। वहीं, कांग्रेस ने सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। इस चुनाव में एनडीए को 243 में से 206 सीटों पर एकतरफा जीत मिली। राजद-लोजपा गठबंधन को महज 25 तो कांग्रेस को चार सीटों से संतोष करना पड़ा। बाकी सात सीटों में से छह निर्दलियों के खाते में गई। वहीं, चकाई सीट पर झामुमो के सुमित कुमार सिंह जीते थे। दलवार आंकड़ों की बात की जाए तो एनडीए की 206 सीटों में से 115 जदयू और 91 सीटें भाजपा के खाते में गई थीं। वहीं, राजद को 22 और लोजपा को 3 सीटों पर जीत मिली थी।
2010 में पूर्णिया प्रमंंडल का नतीजा
2010 में एनडीए ने पूर्णिया में बड़ी जीत हासिल की थी। एनडीए को 17 सीटें मिली थीं। राजद गठबंधन को तीन सीटें और कांग्रेस को तीन सीट मिली थी। एक सीट निर्दलीय के खाते में गई थी। दलवार आंकड़ों की बात करें तो एनडीए में शामिल भाजपा को 13, जदयू को चार सीट पर जीत मिली थी। वहीं, राजद गठबंधन में राजद को एक और उसकी साथी लोजपा को दो सीट मिली थी।
इस चुनाव में पूर्णिया प्रमंडल की कौन सीटें हैं चर्चा में?
पूर्णिया प्रमंडल की सबसे चर्चित सीटों की बात करें तो इनमें धमदाहा,आमौर, कटिहार जैसी सीटें शामिल है। आइये इन सीटों के बारे में जानते हैं।
धमदाहा: यह पूर्णिया जिले की चर्चित सीट है। यहां से मंत्री लेशी सिंह विधायक हैं। लेशी सिंह का मुकाबला राजद के संतोष कुमार से है। संतोष कुमार ने इसी महीने राजद के दामन थामा है। संतोष कुमार 2010 से 2014 तक बायसी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक रह चुके हैं। इसके बाद लोकसभा चुनाव के दौरान पर जदयू में शामिल हो गए। जदयू से पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र से सांसद भी रह चुके हैं।
आमौर: इस सीट से एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान विधायक हैं। वह किशनगंज और पूर्णिया जिले की अलग-अलग सीटों से जीतकर विधानसभा पहुंचते रहे हैं। जदयू ने सबा जफर और कांग्रेस ने अब्दुल जलील मस्तान को यहां से टिकट दिया है।
कटिहार: बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद का गढ़ कटिहार सीट रही है। यहां से वह लगातार चार बार चुनाव जीत चुके हैं। 2020 में तार किशोर प्रसाद कटिहार सीट से चौथी बार विधायक बने। जीत के बाद एनडीए की राज्य में सरकार बनी। इस सरकार में उन्होंने बिहार के उपमुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। वह 16 नवबंर 2020 से 9 अगस्त 2022 तक बिहार के उपमुख्यमंत्री के पद पर रहे। इस बार इस सीट पर वीआईपी के सौरव कुमार अग्रवाल चुनावी मैदान में हैं। वहीं जनसुराज ने गाजी शारिक अहमद को मैदन में उतारा है।
जोकीहाट- इस सीट पर सीमांचल की सियासत के सबसे बड़े चेहरे रहे तस्लीमुद्दीन के दो बेटे आमने सामने हैं। राजद ने यहां से तस्लीमुद्दी के बेटे शाहनवाज आलम को टिकट दिया है। शाहनवाज 2020 में एआईएमआईएम के टिकट पर जीते थे। बाद में उन्होंने राजद का दामन थाम लिया था। वहीं, उनके बड़े भाई सरफराज आलम यहां से जनसुराज के टिकट पर उतरे हैं। 2020 में सरफराज को राजद ने टिकट दिया था। यानी, दोनों भाई पहले भी आमने-सामने चुनाव लड़ चुके हैं।
कदवा- कांग्रेस विधायक दल के नेता शकील अहमद खान एक बार फिर इस सीट से मैदान में हैं। जदयू ने इस सीट पर दुलाल चन्द्र गोस्वामी को टिकट दिया है।
रूपौली- इस सीट पर राजद के टिकट पर बीमा भारती मैदान में हैं। बीमा 2020 में यहां से जदयू के टिकट पर जीती थीं। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उन्होंने राजद का दामन थाम लिया और यहां से इस्तीफा दे दिया। राजद ने उन्हें लोकसभा का चुनाव लड़ाया जिसमें उन्हें पप्पू यादव से हार मिली। इसके बाद हुए उपचुनाव में राजद ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन बीमा भारती को निर्दलीय उम्मीदवार शंकर सिंह से हार का सामना करना पड़ा। एक बार फिर दोनों इस सीट पर आमने-सामने हैं। बाहुबली शंकर सिंह और बीमा भारती के पति अवधेश कुमार मंडल की पुरानी अदावत रही है।