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सिंहासन की जंग: सम्राट की होगी विजय या विजय बनेंगे सम्राट...विरासत की अग्निपरीक्षा

सार

बिहार के चुनावी महासमर का केंद्र भाजपा के दो उप-मुख्यमंत्री हैं विजय कुमार सिन्हा और सम्राट चौधरी। यह सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक भविष्यवाणी है कि इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल इन दोनों नेताओं के नाम में ही छिपा है। चुनाव में जिसकी विजय होगी वही सम्राट होगा।
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सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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बिहार की राजनीतिक रणभूमि इस समय एक अनोखे द्वंद्व की साक्षी बन रही है, जहां दांव पर सिर्फ दो सीटें नहीं, बल्कि भविष्य का सिंहासन है। इस महासमर का केंद्र भाजपा के दो उप-मुख्यमंत्री हैं विजय कुमार सिन्हा और सम्राट चौधरी। यह सिर्फ एक संयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक भविष्यवाणी है कि इस चुनाव का सबसे बड़ा सवाल इन दोनों नेताओं के नाम में ही छिपा है। चुनाव में जिसकी विजय होगी वही सम्राट होगा। ये दोनों नाम केवल संज्ञा नहीं हैं, बल्कि भाजपा की सत्ता संतुलन की रणनीति के दो सबसे बड़े मोहरे हैं। यदि इन दोनों संज्ञाओं का शाब्दिक अर्थ चुनावी नतीजों में परिणत होता है तो दोनों हस्तियां और भाजपा न सिर्फ विजय हासिल करेगी, बल्कि सत्ता का सम्राट भी बनाएगी। तो सवाल ये की विजय और सम्राट दोनों का भविष्य क्या है...इसे समझने के लिए अमर उजाला दोनों उप मुख्यंत्रियों के विधानसभा क्षेत्र लखीसराय और तारापुर पहुंचा।

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भाजपा ने इन चेहरों को उप मुख्यमंत्री बनाकर 'अगड़ा-पिछड़ा' का सशक्त जातीय संतुलन साधने की कोशिश की थी। राज्य में शासन और विकास के साथ-साथ सामाजिक न्याय का भी निर्णायक संदेश देनी की भाजपा की यह कोशिश कितनी फलीभूत होगी, इसका फैसला इन दोनों सीटों के नतीजे भी तय करेंगे।

एक तरफ, अगड़े वर्ग (भूमिहार) से आने वाले विजय कुमार सिन्हा अपने गढ़ लखीसराय में भयमुक्त शासन और विकास के नारों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं, वहीं पिछड़े वर्ग (कुशवाहा) के बड़े चेहरे सम्राट चौधरी अपने पिता की राजनीतिक विरासत तारापुर को बचाने की जद्दोजहद में हैं।
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विवादों के बीच चुनाव: सत्ता का संतुलन और भविष्य का संकेत
दोनों उप-मुख्यमंत्रियों के साथ विवाद भी जुड़े हैं। सिन्हा के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था पर बहस उठी, तो सम्राट चौधरी पर उनके विरोधी खासकर प्रशांत किशोर ने आपराधिक अतीत को लेकर गंभीर हमले किए हैं। इन सबके बीच, केंद्रीय नेतृत्व ने सम्राट चौधरी को लेकर बड़ा संकेत दिया है। अमित शाह जैसे शीर्ष नेता ने उन्हें 'बड़ा आदमी बनाने' की बात कहकर यह स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा पिछड़े वर्ग के इस नेता को भविष्य में राज्य में प्रमुख भूमिका में बनाए रखेगी।

लखीसराय का 'भूमिहार महासमर'
बिहार की राजनीति में लखीसराय विधानसभा क्षेत्र भूमिहारों के दशकों पुराने सांस्कृतिक और चुनावी वर्चस्व का केंद्र है। यह क्षेत्र चर्चित सीट मोकामा से बिल्कुल जुड़ा हुआ है। भाजपा के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा यहां से भयमुक्त शासन और विकास के नारों पर लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला कांग्रेस के अमरेश कुमार 'अनीश' और जन सुराज के डॉ. राजीव रंजन से है।

एनडीए की दोहरी रणनीति और भूमिहार वोटों का विभाजन
सिन्हा के खिलाफ मैदान में उतरे तीनों ही प्रमुख प्रत्याशी भूमिहार समाज से आते हैं, जिससे लगभग 2 लाख भूमिहार वोटों का बंटवारा इस चुनाव का सबसे संवेदनशील गणित बन चुका है। एनडीए दोहरी रणनीति पर चल रहा है। एक ओर, सिन्हा अपने कार्यकाल में टाल (बाढ़ प्रभावित क्षेत्र) और ग्रामीण इलाकों में सड़कों, बिजली पहुंचाने का श्रेय लेते हैं, जिसका असर बुजुर्ग मतदाताओं के बीच दिख रहा है। दूसरी ओर, भूमिहार वोटों के त्रिकोणीय विभाजन का सीधा फायदा एनडीए को गैर-भूमिहार (जैसे वैश्य) वोटों को एकजुट करके मिल सकता है। सिन्हा के खिलाफ लंबे समय से यहां होने के चलते उनके भूमिहार समाज में ही खासा विभाजन होते दिख रहा था। हालांकि, मोकामा की हिंसा के बाद राजनीति ने थोड़ी करवट ली है और भूमिहार वोटरों में बंटवारा पहले जैसा होता नहीं दिख रहा है। यह फैक्टर सिन्हा को थोड़ी राहत दे रहा है।
 

महागठबंधन की सेंधमारी और मोकामा फैक्टर
महागठबंधन का लक्ष्य यादव, मुस्लिम वोटों को एकजुट करके, कुशवाहा और वैश्य वोटों में सेंधमारी करना है। मोकामा में हालिया घटना ने क्षेत्र में कानून-व्यवस्था पर बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। लखीसराय शहर के कुछ हिस्सों में 'लंबे समय से एक ही प्रत्याशी' के खिलाफ निराशा है, जिससे महागठबंधन 'परिवर्तन' और स्थानीय आवाज को मुखर कर रहा है। लखीसराय की जंग तय करेगी कि क्या विकास का नारा और सांस्कृतिक पकड़, एंटी-इंकम्बेंसी और जातीय विभाजन की दरारों को भर पाएगी। वैसे मोकामा की घटना से यहां भूमिहार वोट विजय सिन्हा के पक्ष में लामबंद होते दिखाई दे रहे हैं। इससे महागठबंधन प्रत्याशी डा. राजीव राय जो कि पहले कुछ बढ़त में दिख रहे थे, उसको चुनौती मिली है।

तारापुर का 'कुशवाहा किला' सम्राट के लिए कितना अभेद्य
बिहार के दूसरे उप-मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के लिए मुंगेर जिले की तारापुर सीट सिर्फ एक चुनावी क्षेत्र नहीं, बल्कि चौधरी परिवार की विरासत और कुशवाहा राजनीति के शीर्ष नेतृत्व का प्रश्न है। यह सीट उनके पिता पूर्व मंत्री शकुनी चौधरी का गढ़ रही है, जो समता पार्टी के संस्थापकों में से थे और राष्ट्रीय जनता दल के साथ-साथ अन्य दलों में भी रहते हुए सात बार विधायक और सांसद बने थे।

मुख्यमंत्री पद के संकेत और विकास की आस
सम्राट चौधरी, जो कुशवाहा समुदाय के सबसे बड़े नेताओं में से एक हैं, विधान परिषद छोड़कर विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं। उनके इस कदम के गहरे राजनीतिक मायने हैं, जिसे अमित शाह ने 'बड़ा आदमी बनाने' की बात कहकर और भी स्पष्ट कर दिया है। यानी, भाजपा सम्राट चौधरी को भविष्य में राज्य के सर्वोच्च नेतृत्व के तौर पर देख रही है। सम्राट चौधरी ने डिप्टी सीएम रहते हुए क्षेत्र के लिए रिंग रोड, रेल परियोजना और औद्योगिक पार्क जैसी कई विकास योजनाओं का शिलान्यास किया है। एनडीए का भरोसा कुशवाहा वोटों को एकजुट करने के साथ-साथ अपने परंपरागत सवर्ण और वैश्य मतदाताओं के थोक वोट पर है।
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महागठबंधन की चुनौती: आपराधिक अतीत और 'बाहरी' का मुद्दा
तारापुर में सम्राट चौधरी का मुकाबला सीधे महागठबंधन के राजद प्रत्याशी अरुण कुमार साह से है। जन सुराज के डॉ. संतोष सिंह के मजबूती से लड़ने से यहां मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। साह की सबसे बड़ी ताकत उनकी अपनी वैश्य जाति का मजबूत समर्थन और 2021 के उपचुनाव में जेडयू प्रत्याशी को 4000 से भी कम मतों के अंतर से कड़ी टक्कर देने का अनुभव है। हालांकि, उनकी कमजोरी यह है कि उन्हें सम्राट चौधरी के राष्ट्रीय कद और स्थानीय 'विकास' के नारों का सामना करना पड़ रहा है। महागठबंधन की रणनीति स्पष्ट है कि यादव और मुस्लिम वोटों को एकजुट कर वैश्य वोटों को मजबूती देना और इस उम्मीद में कुशवाहा वोटों में सेंध लगाना कि 'बाहरी उम्मीदवार' का मुद्दा सम्राट चौधरी के खिलाफ काम करे।

सम्राट पर पीके ग्रहण
सम्राट के खिलाफ सबसे बड़ा विवाद प्रशांत किशोर के आरोपों से जुड़ा है। उन्होंने सम्राट चौधरी पर 1995 के एक मर्डर केस का आरोप लगाकर सनसनी फैला दी है। उन्होंने इस चुनाव को 'अपराधी' बनाम 'डॉक्टर, वकील और शिक्षाविद' की लड़ाई बना दिया है। तारापुर की यह जंग तय करेगी कि क्या सम्राट चौधरी का राष्ट्रीय कद और विकास का नारा उनके पिता की विरासत को फिर से स्थापित कर पाएगा, या जातीय समीकरण और विरोधी दलों के व्यक्तिगत हमलों के सामने उन्हें कड़ी चुनौती मिलेगी।
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