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चुनावी किस्से: नेहरू के निधन के बाद हुए चुनाव में यहां हुआ कांग्रेस का बुरा हाल, पार्टी अध्यक्ष तक को मिली हार

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: जयदेव सिंह Updated Mon, 18 Mar 2024 08:38 PM IST

सार

चुनावी किस्से: 1967 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 283 सीटों पर सिमट गई। 520 सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस को बहुमत मिल गया लेकिन नतीजे बता रहे थे कि पार्टी का जनाधार घट रहा है। चुनावी किस्से की इस कड़ी में जानते हैं 1967 के चुनाव में क्या हुआ...
 
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इंदिरा गांधी - फोटो : AMAR UJALA
देश की आजादी को 20 साल हो चुके थे। इन 20 वर्षों में देश की सियासी तस्वीर बहुत बदल चुकी थी। ये साल एक और चुनाव का साल था। ये पहला चुनाव था जब नेहरू चुनाव के प्रचार का केंद्र नहीं थे। नेहरू के निधन के बाद देश की सियासत बदल चुकी थी। पाकिस्तान के साथ युद्ध में विजय और उसके बाद शास्त्री की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के बाद सत्ता की कमान इंदिरा गांधी के हाथ में थी। सत्ता में हो रही इस उथल-पुथल के बीच देश के हालात में भी बहुत से बदलाव आए थे। इन बदलावों को देखकर कई विदेशी पत्रकार तो यहां तक भविष्यवाणी करने लगे थे कि शायद 1967 का लोकसभा चुनाव होगा ही नहीं। जिस तरह पाकिस्तान और बर्मा जैसे देशों में सैनिक सत्ता आ चुकी थी। उसी तरह की स्थिति भारत में हो सकती है। विदेशी पत्रकारों की इस भविष्यवाणी की वजह उस वक्त भारत में फैला क्षेत्रीय तनाव, धार्मिक कट्टरता, खाद्यानों की कमी, मुद्रास्फीति की दर और तेजी से बढ़ती आबादी थी। 

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इंदिरा गांधी - फोटो : AMAR UJALA
देश की आजादी को 20 साल हो चुके थे। इन 20 वर्षों में देश की सियासी तस्वीर बहुत बदल चुकी थी। ये साल एक और चुनाव का साल था। ये पहला चुनाव था जब नेहरू चुनाव के प्रचार का केंद्र नहीं थे। नेहरू के निधन के बाद देश की सियासत बदल चुकी थी। पाकिस्तान के साथ युद्ध में विजय और उसके बाद शास्त्री की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत के बाद सत्ता की कमान इंदिरा गांधी के हाथ में थी। सत्ता में हो रही इस उथल-पुथल के बीच देश के हालात में भी बहुत से बदलाव आए थे। इन बदलावों को देखकर कई विदेशी पत्रकार तो यहां तक भविष्यवाणी करने लगे थे कि शायद 1967 का लोकसभा चुनाव होगा ही नहीं। जिस तरह पाकिस्तान और बर्मा जैसे देशों में सैनिक सत्ता आ चुकी थी। उसी तरह की स्थिति भारत में हो सकती है। विदेशी पत्रकारों की इस भविष्यवाणी की वजह उस वक्त भारत में फैला क्षेत्रीय तनाव, धार्मिक कट्टरता, खाद्यानों की कमी, मुद्रास्फीति की दर और तेजी से बढ़ती आबादी थी। 

एक अंग्रेज पत्रकार ने तो यहां तक भविष्यवाणी कर दी थी कि भारत में अकाल का खतरा मंडरा रहा है और सरकार कुछ भी कर पाने में नाकाम है। जनता सरकार को भ्रष्ट मानने लगी है। सरकार और सत्ताधारी कांग्रेस जनता का भरोसा खो चुकी है। लोगों को अपना भविष्य सिर्फ अंधकारमय ही नहीं, बल्कि अनिश्चित भी लग रहा है। प्रांतों ने भी उप-राष्ट्रों की तरह व्यवहार करना शुरू कर दिया है। उस पत्रकार की राय में इतनी जल्दी लोकतंत्र के चरमराने से देश तत्काल दूसरा उपाय ढूंढ़ेगा। ऐसी सूरत में सेना ही वो एकमात्र संगठन होगी, जो देश को बचा पाएगी। 

1967 के चुनाव में कांग्रेस को नुकसान
दुनिया भारत को लेकर कयास लगा रही थी, पर इस महान देश ने कुछ और तय किया था। वो देश जिसके लिए 15 साल पहले चुनाव एक नया अनुभव थे, उसने चुनावों का पूरी तरह से भारतीयकरण कर लिया था। चुनाव देश में एक ऐसे उत्सव के रूप में बदल चुके थे जिसके अपने नियम बन चुके थे। कुछ अपवादों को छोड़कर हर पांच साल पर इन्हें दोहराया जाने लगा था। लोग बड़े उत्साह और ऊर्जा से इनमें हिस्सा लेते थे। नेहरू ने नेतृत्व के बिना चुनाव लड़ रही कांग्रेस को इस चुनाव में नुकसान के अनुमान जताए जा रहे थे। नतीजे आए तो विश्लेषकों के अनुमान सच साबित हुए। 1962 में 361 सीट जीतने वाली कांग्रेस 1967 के चुनाव में 283 सीटों तक सिमट गई। 520 सीटों वाली लोकसभा में कांग्रेस को बहुमत मिल गया। इसके बाद भी नतीजे बता रहे थे कि कांग्रेस का जनाधार घट रहा है। 1962 में करीब 45 फीसदी वोट शेयर हासिल करने वाली कांग्रेस का वोट शेयर भी घटकर करीब 41 फीसदी रह गया। कांग्रेस का लोकसभा चुनावों से ज्यादा बुरा हाल राज्यों के विधानसभा चुनाव में हुआ। सबसे बुरे नतीजे मद्रास के रहे, जहां से पार्टी के कद्दावर नेता तक हार गए। केरल में भी पार्टी को बड़ा नुकासन हुआ। 

पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज - फोटो : K.Kamaraj FB Page
पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक चुनाव हार गए
मद्रास में द्रविड़ मुनेत्रा कड़गम यानी डीएमके ने बहुत बड़ी जीत हासिल की। पार्टी ने विधानसभा की 234 सीटों में से 137 पर कब्जा कर लिया। कांग्रेस महज 51 सीटों पर सिमट गई। डीएमके के नेता सी.एन. अन्नादुरई राज्य के मुख्यमंत्री बने। अन्नादुरई के पार्टी बनाने का किस्सा हम अपने पिछले चुनावी किस्से में बता चुके हैं। कांग्रेस के लिए मद्रास की हार बहुत बड़ी थी। यह हार इसलिए भी बड़ी थी क्योंकि उस दौर में पार्टी के कई बड़े नेता मद्रास जिसे अब तमिलनाडु कहते हैं से आते थे। इनमें से कई बड़े नेता इस चुनाव में हार गए। यहां तक की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज को भी एक 29 साल के युवा छात्र नेता पी. श्रीनिवासन ने हरा दिया था। बाद में श्रीनिवासन तमिलनाडु विधानसभा के उपाध्यक्ष भी बने। 

इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब 'इंडिया आफ्टर नेहरू' में लिखते हैं कि जब कामराज के हार की खबर मद्रास पहुंची तो जश्न में डूबे हुए डीएमके कार्यकर्ताओं ने श्रीनिवासन नाम के एक दूसरे नौजवान को खोजकर घोड़े पर बिठाया और पूरे शहर में विजय जुलूस निकाला। कांग्रेस अध्यक्ष की हार के बारे में एक साप्ताहिक ने लिखा कि ‘देश और विदेश में भी, राजनीतिक प्रतिष्ठा की अगर बात की जाए तो कामराज की हार, देश की आजादी के बाद कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा झटका है।’
 

एम करुणानिधि - फोटो : DMK
जीत में अभिनेता की भूमिका भी रही
मद्रास में डीएमके की जीत में बड़ी भूमिका उनके हिंदी-विरोधी अभियानों की मानी गई। हालांकि, इसे चलते हुए काफी समय हो गया था। इसके साथ तमिल अभिनेता एमजी रामचंद्रन की भूमिका भी बेहद अहम मानी मानी गई। अपने हिन्दी विरोधी अभियान से डीएमके ने मद्रास के कस्बों और गांवों तक में अपना संगठन खड़ा कर लिया था। गांव-गांव तक डीएमके का संगठन बढ़ाने में भी तमिल फिल्म उद्योग ने उसकी बड़ी मदद की।
 
इसमें पार्टी के बड़े नेताओं में शामिल एम करुणानिधि से लेकर एमजीआर तक शामिल थे। करुणानिधि तमिल फिल्मों के बड़े पटकथा लेखक थे तो एमजीआर राज्य के सबसे चर्चित अभिनेता थे। उनकी लोकप्रियता का भी डीएमके को बहुत फायदा हुआ। तमिलनाडु की जनता, खासकर गांवों और कस्बों में दीवानगी की हद तक उन्हें चाहती थी।     

एक घटना ने भी चीजें बदलीं
1967 के चुनाव से ठीक एक महीने पहले हुई एक घटना ने भी डीएमके की जीत में बड़ी भूमिका निभाई थी। दरअसल, चुनाव से ऐन पहले एमजीआर पर गोली चलाई गई और वे घायल हो गए। चुनाव प्रचार दौरान डीएमके के कार्यकर्ताओं ने गांवों और कस्बों में घायल एमजीआर की तस्वीरें चिपका दीं। अपने नायक की पार्टी को जिताने के लिए लोग बड़ी तादाद में मतदान केंद्रों पर पहुंचे। एमजीआर ने खुद भी चुनाव लड़ा और बड़े अंतर से जीत दर्ज की। बाद में एमजीआर राज्य के मुख्यमंत्री भी बने। वो किस्सा फिर कभी।
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