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ओमान पाकिस्तानी बलूचों को नौकरी क्यों नहीं दे रहा

Sat, 06 Jul 2019 04:56 PM IST
Garima Garg जॉब डेस्क, अमर उजाला
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"मैंने अपनी जिंदगी के पांच साल इस इंतजार में गुजारे हैं कि कहीं से मेरी नौकरी को लेकर कोई जवाब आएगा। लेकिन अब तक किसी ने कुछ भी नहीं बताया है और ऐसा महसूस कराया जा रहा है जैसे मैं कुछ गलत करने जा रहा हूं।"

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25 साल के गहराम बलोच का ये बयान ओमानी फौज में भर्ती होने के लिए इंटरव्यू को लेकर है। वो 330 से ज्यादा के करीब बलूच नौजवानों में से एक हैं जो नौकरी के लिए इंटरव्यू के पांच साल बाद भी जवाब के इंतजार में हैं।

एक पाकिस्तानी शहरी का एक दूसरे देश की फौज में भर्ती का ख्वाहिशमंद होना शायद आपको अजीब लगे लेकिन पाकिस्तान के सूबे बलूचिस्तान के तटीय क्षेत्र ग्वादर के लोगों के लिए खाड़ी देश ओमान में नौकरी की ख्वाहिश कोई अजीब चीज नहीं है।
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बलूचिस्तान से ओमान जाने वालों में बड़ी संख्या छात्रों और मेहनतकशों की रही है। हालांकि पिछले कुछ सालों में ये प्रक्रिया अपने अंत तक पहुंचती नजर आ रही है।

ओमानी अधिकारियों की तरफ से बलूच नौजवानों की अपनी फौज में आखिरी बाकायदा भर्ती तो 1999 में की गई थी जबकि उसके बाद 2014 में जिन लोगों के इंटरव्यू लिए गए उन्हें आज तक जवाब नहीं दिया गया।

इस बारे में वर्ल्ड बैंक की अप्रैल 2019 में प्रकाशित होने वाली रिपोर्ट के मुताबिक, खाड़ी देशों में दक्षिणी एशिया से मज़दूरों के जाने की प्रक्रिया बहुत हद तक कम हो गई है।

इन देशों में ओमान का नाम भी लिया गया है जहां रिपोर्ट के मुताबिक मेहनतकशों की भर्तियों की प्रक्रिया में कमी की एक वजह वहां पर होने वाली 'ओमानाइजेशन' है, जिसका मतलब किसी भी तरह की भर्तियां करते वक्त अपने शहरियों को तरजीह देना है।

पाकिस्तान और ओमान के बीच समझौते में यह तय किया गया था कि बलूच के लोगों को ओमान फौज में भर्ती किया जाएगा

ओमान और ग्वादर के संबंधों का इतिहास
बलूचिस्तान और ओमान सल्तनत के संबंध खासे पुराने हैं। एक अनुमान के मुताबिक, मकरानी बलूच ओमान की आबादी का 25 फीसद हिस्सा हैं और इन्हें वहां अलबलूशी पुकारा जाता है।
1908 में प्रकाशित होने वाली किताब 'गजेटियर ऑफ परशियन गल्फ, ओमान एंड सेन्ट्रल अरबिया' अरब और फारस की खाड़ी में काम करने वाले ब्रिटिश दूतावास के कर्मचारियों के लिए इलाके के बारे में जानकारी के लिए खासा महत्वपूर्ण समझा जाता था।

इसके लेखक जॉन लारिमर के मुताबिक 18वीं सदी में खान ऑफ कलात नूरी नसीर खान के दौर में ओमान के एक शहजादे 'बाहोट' बनकर यानी पनाह की तलाश में इनके पास आए थे।

शहजादे ने अपनी सल्तनत वापस हासिल करने के लिए बलूचिस्तान से मदद की गुजारिश की थी लेकिन नूरी नसीर खान इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे।

बीबीसी से बात करते हुए शोधकर्ता और प्रोफेसर हफीज जमाली का कहना था, "खान ऑफ कलात ने उस वक्त ग्वादर के बंदरगाह जो तब महत्वहीन था उनको तोहफे के तौर पर दे दिया ताकि इससे होने वाली आमदनी से वो अपना गुजारा कर सकें। फिर ग्वादर बाकायदा तौर पर ओमानी सल्तनत का हिस्सा बन गया।"

हालांकि बलोच राष्ट्रवादी इस बयान को नहीं मानते और उनका मानना है कि ओमानी शहजादे को ग्वादर अस्थायी तौर पर उनकी हिफाजत के लिए दिया गया था और उन लोगों को ग्वादर पर पूरा हक़ हासिल नहीं था।

बलूचिस्तान के तटीय इलाके ग्वादर को देखा जाए तो वहां आज भी ओमानी दौर के किले सदियों पुराने शाही बाजार में नजर आते हैं। ये ग्वादर के एक दौर की तस्वीर पेश करते हैं जब सरहदें सिर्फ एक लकीर समझी जाती थीं और सफर दुश्वार होने के बावजूद लोग काम की वजह से विभिन्न देशों में आते-जाते रहते थे।

गहराम बलोच के खानदान से संबंध रखने वाले कई लोग भी ऐसे ही जमाने में वहां चले गए थे जब ओमानी फौज में काम करने के कारण ओमान की नागरिकता मिलना खासा आसान था।

प्रोफेसर हफीज जमाली ने जॉन लारिमर की लिखी हुई बात दोहराते हुए कहा कि 'जब ओमानी सल्तनत का फैलाव हुआ यानी जब ओमान ने अफ्रीका और भारत के समुद्र तक अपना कब्जा जमाया तो मकरान के बलोच बतौर सिपाही ओमान के फैलाव में एक अहम किरदार निभाते हुए उभरे।'

प्रोफेसर हफीज जमाली के मुताबिक, जब ओमानी सल्तनत का विस्तार शुरू हुआ तो मकरान के बलोचों ने बतौर सिपाही इसमें भाग लिया।

ओमानी फौज में बलोच सिपाही

जब 1947 के बाद भारत और पाकिस्तान दो आजाद देश बने तो पाकिस्तान सरकार ने ओमान की सल्तनत से ग्वादर को अपनी जमीन से नजदीक होने की बुनियाद पर खरीदने की बात की। यह अनुबंध सन् 1958 में तय पाया जिसके तहत पाकिस्तान ने ओमान से ग्वादर 84 लाख डॉलर में खरीद लिया।

इस अनुबंध में यह भी तय किया गया था कि बलूचिस्तान के लोगों को ओमानी फौज में भर्ती किया जाएगा। इस नियम पर अमल भी हुआ लेकिन 1958 के बाद नियम सिर्फ नियम भर रह गया।

इसकी वजह प्रोफेसर हफीज जमाली ने बताई, "ओमानी सल्तनत पहले जिन लोगों को भर्ती करती थी वो आस-पास के इलाकों को जीतने के इरादे से करती थी जिसमें उन्हें प्रशासन संभालने के लिए लोगों की जरूरत पड़ती थी। 1958 के बाद तो ओमानी सल्तनत खुद खाड़ी द्वीप तक सीमित रह गई तो अफ्रीकी इलाके मुमबासा और जेनजीबार जहां बलोच सिपाहियों ने जाकर ओमानियों की तरफ से व्यवस्था संभाली वो इनसे अलग हो गए क्योंकि उस समय दुनिया भर में तब्दीलियां आई थीं।"

इस स्थिति में ओमान को बलोच सिपाहियों की जरूरत नहीं रही लेकिन प्रतीकात्मक बुनियादों पर कम संख्या में भर्तियां जारी रहीं।

हफीज जमाली ने बताया, "उस दौरान बलोच सिपाहियों की एक खास तादाद की जरूरत उस समय पेश आई थी जब 1970 के दशक में ओमान में स्थानीय बगावत हुई थी। इस बगावत से निपटने के लिए लोगों की भर्तियां करनी पड़ी थीं लेकिन ये वक्ती भर्तियां थीं जो इस मसले के हल के बाद खत्म हो गई थीं।"

जब 1970 के दशक में तेल की खोज हुई और तो ग्वादर और मकरान के लोगों की दिलचस्पी ओमान जाने में और बढ़ गई। इस पर ओमाम की तरफ से प्रतिबंध लगाई गई कि अब नए लोगों को नागरिकता नहीं दी जाएगी।

प्रतीकात्मक बुनियादों पर ओमानी फौज में भर्तियां बहुत हद तक कम होने की एक वजह बलूचिस्तान में विद्रोह से जुड़ी है।

बलूचिस्तान के इलाके कैच में ओमानी फौज में भर्ती होने के लिए आस लगाए बैठे लोगों में बलिख शेर भी हैं। उन्होंने बीबीसी को बताया कि 'इंटरव्यू के दौरान मुझ से सैन्य प्रवक्ता ने कहा कि अगर हम आपको ओमान जाने देते हैं तो क्या आप वहां पर ली गई फौजी ट्रेनिंग पाकिस्तान के ख़िलाफ इस्तेमाल तो नहीं करेंगे?'

बलिख शेर का कहना था कि 'मेरे पास इस बात का जवाब नहीं था, सिवाए हैरानी जाहिर करने के क्योंकि मैं सिर्फ नौकरी के लिए वहां जाना चाहता हूं। मुझे इंटरव्यू से ज्यादा तफ्तीश लग रही थी। अब मैं ज्यादा खौफजदा हूं।'

शोधकर्ताओं का मानना है कि कहीं न कहीं ये शक हर देश में पाया जाता है। शोधकर्ता अमीम लुत्फी की रिसर्च ओमानी बलोच और खाड़ी देशों में उनके रिहाइश के गिर्द घूमती है।

बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा कि 'इसकी वजह दुबई, शारजा, मस्कट और बहरैन में चंद ऐसी जगहें हैं जो अलगाववादी सोच रखने वाले लोगों के गढ़ कहलाते हैं।'

अमीम का कहना था कि 'इनमें से जो गिरोह ईरान विरोधी हैं उनका खाड़ी देश भी साथ देते हैं लेकिन साथ ही इस बात का भी खास ख्याल रखते हैं कि पाकिस्तान विरोधी प्रोपेगंडा को पनपने न दें।'

इसकी एक और वजह फौजी फाउंडेशन का भर्तियों के मामले में पेश होना है। सन् 2010 में फौजी फाउंडेशन के विदेशों में भर्तियों के लिए एक फर्म बनाई थी ताकि बलूचिस्तान और अन्य इलाकों के बेशुमार लोग निजी संबंध के बजाए इनके जरिए बाहर जाएं।

लेकिन अमीम के मुताबिक 'इस अमल का मकसद विदेशी फौज में भर्तियों को खत्म करना था जो बहुत हद तक हो चुका है।'

जानकारों के मुताबिक इस समय दुनिया भर में मॉडर्न मिलिट्राइजेशन का रूझान देखने में आ रहा है जिसके नतीजे में खाड़ी देशों और खासकर ओमान ऐसे लोगों को भर्ती करना चाह रहा है जो सही तरीके से प्रशिक्षित हो वर्ना वो अपने लोगों पर संतोष करना चाहता है।

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'हम जहां हैं, वहीं ठीक हैं'
ओमान के शहर मस्कट के देशी इलाके वादिये हतात में ज्यादातर आबादी तिरबत और ग्वादर से आने वाले लोगों की है।

गहराम और बलिख शेर के ज्यादातर रिश्तेदार इसी इलाके से संबंध रखते हैं लेकिन अब गहराम ओमान जाने के बारे में उम्मीद नहीं रखते। अब वो बच्चों को पढ़ाकर अपना गुजारा करना चाहते हैं।

इनके मुताबिक 'दूसरे देश की फौज में भर्ती होकर मैं अपने देश में रहने वाले अपने मां-बाप और रिश्तेदारों को रूस्वा नहीं करना चाहता। मैं इसके लिए तैयार नहीं हूं। मैं जहां हूं, वहीं ठीक हूं।'

इधर बलिख शेर का कहना था कि 'हम दुनिया के किसी भी मुल्क चले जाएं हमें शक की निगाह से ही देखा जाता है। इसकी एक वजह हमारे देश का हमारे खिलाफ पक्षपाती रवैया है।'

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