पुणे के भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान यानी आईआईएसईआर की लाइब्रेरी से उमर खालिद की किताब हटाने का मामला चर्चा में है। यह किताब हाल ही में लाइब्रेरी में शामिल की गई थी, लेकिन सोशल मीडिया पर इस पर सवाल उठने के बाद संस्थान ने इसे हटाने का फैसला लिया। संस्थान का कहना है कि ऐसा किसी गलतफहमी या अशांति से बचने के लिए किया गया। इस फैसले के बाद किताब के विषय, लेखक और शैक्षणिक संस्थानों में पुस्तकों के चयन को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।
कौन सी किताब हटाई गई?
आईआईएसईआर पुणे की लाइब्रेरी से उमर खालिद की किताब ‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज: आदिवासी हिस्ट्रीज एंड द पॉलिटिक्स ऑफ पावर’ हटाई गई है। इसका हिंदी अर्थ है ‘बंटे हुए समुदाय: आदिवासी इतिहास और सत्ता की राजनीति’। यह किताब उमर खालिद के पीएचडी शोध पर आधारित है। इसे वर्ष 2026 में प्रकाशित किया गया था। इसमें झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र के आदिवासी समुदायों के इतिहास और सत्ता के साथ उनके संबंधों का अध्ययन किया गया है। किताब में खास तौर पर हो समुदाय के इतिहास और ब्रिटिश शासन के दौरान उसके अनुभवों पर ध्यान दिया गया है।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई?
इस मामले की शुरुआत सोशल मीडिया मंच एक्स पर एक पोस्ट से हुई। इसमें आईआईएसईआर पुणे की लाइब्रेरी में उमर खालिद की किताब को नई पुस्तकों की सूची में शामिल किए जाने पर सवाल उठाया गया था। पोस्ट में इस बात पर आपत्ति जताई गई कि विज्ञान और शोध से जुड़े केंद्र सरकार के संस्थान की लाइब्रेरी में उमर खालिद की किताब क्यों रखी गई। इसके बाद किताब की तस्वीर सोशल मीडिया पर फैलने लगी और मामला चर्चा में आ गया। अधिकारियों के संज्ञान में मामला आने के बाद संस्थान ने किताब को लाइब्रेरी से हटाने का फैसला लिया।
संस्थान ने क्या सफाई दी?
आईआईएसईआर पुणे ने अपने बयान में कहा कि लाइब्रेरी में किताबें संस्थान के सदस्यों की सिफारिशों के आधार पर शामिल की जाती हैं। इसके लिए एक समिति भी काम करती है, जो लाइब्रेरी के संचालन की देखरेख करती है। संस्थान के मुताबिक, हर महीने अलग-अलग विषयों की 50 से अधिक किताबें लाइब्रेरी में जोड़ी जाती हैं। उमर खालिद की किताब पर मामला सामने आने के बाद इसे सावधानी के तौर पर हटाने का फैसला किया गया, ताकि किसी तरह की गलतफहमी या अशांति न हो। संस्थान ने यह भी कहा कि आगे क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इसकी जांच की जाएगी।
किताब में क्या लिखा है?
‘फ्रैक्चर्ड कम्युनिटीज’ उमर खालिद के पीएचडी शोध पर आधारित है। इसमें आज के झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र में आदिवासी समुदायों के करीब दो सौ वर्षों के इतिहास का अध्ययन किया गया है। किताब में ब्रिटिश शासन, शासन व्यवस्था के विकास और आदिवासी समुदायों तथा राज्य के बीच सत्ता संबंधों को समझने की कोशिश की गई है। इसमें हो समुदाय पर विशेष ध्यान दिया गया है। किताब का मुख्य विषय आदिवासी इतिहास और सत्ता की राजनीति है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह एक शोध आधारित पुस्तक है। इसे लाइब्रेरी से हटाने का फैसला इसके विषय पर किसी घोषित प्रतिबंध के रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए।
कौन हैं उमर खालिद?
उमर खालिद जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और कार्यकर्ता हैं। उन्हें सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था। उन पर फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए दंगों से जुड़े कथित बड़े षड्यंत्र के मामले में गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे। वह इस मामले में विचाराधीन कैदी हैं। उनकी कानूनी स्थिति और उनकी किताब का शोध विषय अलग-अलग पहलू हैं। इस घटना ने लाइब्रेरी में किताबें चुनने की प्रक्रिया और शैक्षणिक सामग्री तक पहुंच को लेकर बहस को जन्म दिया है।