ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी इरना ने चार अक्टूबर को इस बात की पुष्टि की है कि ईरानी फुटबॉल फेडरेशन ने फीफा से वादा किया है कि 10 अक्टूबर को तेहरान आजादी स्टेडियम में होने वाले फुटबॉल मैच में ईरानी महिलाओं को आने की अनुमति देगा।
देखते-देखते बिक गए टिकट
महिलाओं को टिकट देने के लिए शुरू में अलग से व्यवस्था की गई थी। ईरना समाचार एजेंसी के अनुसार एक घंटे से कम वक्त में ही सारे टिकट बिक गए। 2022 में वर्ल्ड कप क्वॉर्टर फाइनल मैच के लिए स्टेडियम में महिलाओं के बैठने की व्यवस्था बढ़ाई जा रही है।
ईरना का कहना है कि तीन अतिरिक्त लाइनें बैठने के लिए बनाई गई थीं और इन सीटों के टिकट तत्काल ही बिक गए। इसका मतलब ये हुआ कि कम से कम 3,500 ईरानी महिलाएं स्टेडियम मैच देखने आएंगी।
समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने फीफा के अधिकारियों के बयान का हवाला देते हुए बताया है कि कुल 4,600 टिकट महिलाओं के लिए उपल्बध कराए जाएंगे और उम्मीद थी कि मांग इससे कहीं ज्यादा होगी।
स्टेडियम में क्षमता एक लाख दर्शकों की है। फीफी का कहना है कि वो अपने पर्यवेक्षकों को तेहरान भेजेगा और इस बात को सुनिश्चित करेगा कि महिलाएं मैच देख रही हैं या नहीं।
'द ब्लू गर्ल'
ईरान की 29 साल की फुटबॉल प्रशंसक सहर खोडयारी ने आत्मदाह कर लिया था। सहर को स्टेडियम में घुसने से पहले गिरफ्तार कर लिया गया था। सहर की मौत के बाद से ईरान पर अंतर्राष्ट्रीय दबाव था कि वो महिलाओं स्टेडियम में आकर मैच देखने की अनुमति दे।
सहर को लोग प्यार से 'द ब्लू गर्ल' कहने लगे थे। उनकी पसंदीदा टीम एस्टेगलल फ़ुटबॉल क्लब थी और इसका कलर ब्लू था। इसलिए सहर को लोग प्यार से ब्लू गर्ल कहने लगे थे। सहर ने पिछले महीने आत्मदाह कर लिया था, जिसमें वो 90 फीसदी जल गई थीं।
रूढ़िवादी शिया मुस्लिम देश ईरान ने 1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद से स्टेडियम में महिलाओं के आने पर पाबंदी लगा दी थी। इस्लामिक धार्मिक नेताओं का तर्क था कि महिलाओं को 'पुरुषवादी माहौल' और 'आधे-अधूरे कपड़े पहने मर्दों' को देखने से बचना चाहिए।''
ईरानी राष्ट्रपति हसन रूहानी ने ईरानी समाज में आधुनिक मूल्यों को लाने का वादा किया था लेकिन वो इस मोर्चे पर लगभग नाकाम रहे। ईरान में महिलाएं आज भी दोयम दर्जे की नागरिक रहने पर मजबूर हैं।
सुधारवादी ईरानी सांसद परवानेह सलाहशौरी ने ट्विटर पर लिखा, ''जहां महिलाओं की तकदीर पुरुष तय करते हैं और उन्हें बुनियादी मानवाधिकारों से वंचित रखते हैं। जहां महिलाएं पुरुषों की निरंकुशता में सहभागी बनती हैं, वहां हम सभी जलकर मरने वाली लड़कियों के लिए जिम्मेदार हैं।''
गिरफ्तारी के बाद थीं परेशान
ईरान में सहर की मौत के बाद महिलाओं के अधिकारों से जुड़े एक्टिविस्ट काफी सक्रिय हो गए। ईरान की महिलाएं पिछले आठ दशक से चाहे वो पहलवी वंश का शासन रहा हो या इस्लामिक रिपब्लिक, भेदभाव वाले कानून से पीड़ित रही हैं।
सहर की गिरफ्तारी के बाद से ही समस्या शुरू हो गई थी। वो जमानत पर रिहा थीं। उन पर सार्वजनिक मर्यादा तोड़ने और सुरक्षाबलों को अपमानित करने का आरोप तय किया गया था क्योंकि उन्होंने हिजाब नहीं पहना था।
सहर को दो सितंबर को कोर्ट ने समन भेजा था और उनसे कहा गया था कि छह महीने की जेल हो सकती है। ईरान की रोकना न्यूज से सहर की बहन ने कहा कि वो इन सब चीजों से परेशान थीं इसलिए ख़ुद को आग के हवाले कर दिया।
ओपन स्टेडियम मूवमेंट के पीछे ईरानी महिलाएं खुलकर सामने आईं। सहर की मौत की रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छा गई। इसके बाद फीफा भी हरकत में आया। फीफा के चेयरमैन जियानी इन्फैटिनो ने कहा, ''हमारा रुख बिल्कुल स्पष्ट है। महिलाओं को स्टेडियम में जाने की अनुमति मिलनी चाहिए।''
सीआईए वर्ल्ड फैक्टबुक स्टैटिटिक्स के अनुसार ईरान की आठ करोड़ की आबादी में 60 फीसदी लोग 30 साल से कम उम्र के हैं। ईरान में तकनीकी रूप से फेसबुक और ट्विटर प्रतिबंधित है लेकिन ज्यादातर युवा प्रतिबंध की उपेक्षा कर वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं।
वॉशिंगटन बेस्ड फ्रीडम हाउस 2018 की स्टडी के अनुसार ईरान में 60 फीसदी लोग इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में इस आंदोलन को सोशल मीडिया के जरिए काफी फैलाया गया।
1979 में इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं पर कई तरह की पाबंदी लगा दी गई थी। लेकिन इस बार सरकार को झुकना पड़ा।
आयतोल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी के शासन में महिलाओं को बाल ढंकने पर मजबूर किया गया और उनसे तलाक फाइल करने का हक भी वापस ले लिया गया था। टाइट कपड़े पहने को लेकर भी महिलाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
शराब और संगीत पर भी पाबंदी लगा दी गई। अब यहां की महिलाएं कह रही हैं कि उन्हें चुनने की आजादी दी जाए कि वो इस्लामिक कोड के हिसाब से कपड़े पहनना चाहती हैं या नहीं।