न जाने कितने सालों से लोग गिनती के लिए उंगलियों का इस्तेमाल कर रहे थे। चूंकि हाथ की अंगुलियां 10 होती हैं इसलिए जीरो से पहले लोग दस अंको का ज्ञान समझते थे। पर हां, लोगों को उन्हें लिखना नहीं आता था। अंको की समझ होने के बाद वे उन्हें एक रूप नहीं दे पा रहे थे। उन्हें ये रूप भारत ने दिया, जीरो के अविष्कार से।
होता था एबैकस का प्रयोग-
बता दें कि जीरो की खोज से पहले ही ग्रीक के लोग जीरो के बारे में जानते थे पर वे लोग इसे एक अंक नहीं मानते थे। द गार्जियन में छपी रिपोर्ट में George Auckland और Martin Gorst ने बताया कि इस वक्त बिना अंकों के रोमन में जोड़-घटाव होता था। बता दें कि वे एबैकस या फ्रेम का प्रयोग करते थे। उस वक्त जीरो की जगह पर डॉट का यूज करते थे। बाद में डॉट की जगह शून्य नेे ले ली थी।
चीन में होता था डेसिमल प्लेस वैल्यू सिस्टम का प्रयोग-
चीन में जीरो की जगह कॉलम का इस्तेमाल किया गया। बता दें जोड़-घटा के लिए डेसिमल प्लेस वैल्यू सिस्टम का प्रयोग करते थे। चूंकि उस वक्त बड़े अंक लिखना मुश्किल था इसलिए वे अंकों के स्थान पर चित्रों का इस्तेमाल करते थे।
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