फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Vikas Divyakirti: 'बनाने वालों ने इन्हें खुद ठीक से नहीं पढ़ा...', UGC मामले पर क्या बोले विकास दिव्यकीर्ति सर?

Thu, 29 Jan 2026 09:26 PM IST
आकाश कुमार एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

Vikas Divyakirti: डॉ. विकास दिव्यकीर्ति ने यूजीसी के नए नियमों को जल्दबाजी में बना हुआ बताया। उन्होंने कहा कि इनमें पूर्वोत्तर छात्रों, भाषाई विविधता और कई प्रकार के भेदभाव को नजरअंदाज किया गया है और फोकस सिर्फ जाति तक सीमित रखा गया है।
 
विज्ञापन
विकास दिव्यकीर्ति - फोटो : instagram.com/divyakirti.vikas
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

Vikas Divyakirti On UGC Regulations: यूजीसी (UGC) द्वारा हाल ही में लागू किए गए नए नियमों को लेकर मशहूर शिक्षक और दृष्टि आईएएस के संस्थापक डॉ. विकास दिव्यकीर्ति ने कड़ा रुख अपनाया है। उनका कहना है कि कॉलेज और विश्वविद्यालयों में समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाए गए ये नियम अपने लक्ष्य से भटकते नजर आते हैं। 

विज्ञापन


विकास सर के मुताबिक, नियमों का मसौदा तैयार करते समय कई अहम पहलुओं को या तो नजरअंदाज किया गया या फिर उन्हें पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया गया।

Trending Videos

समानता के नाम पर अधूरा खाका

डॉ. विकास दिव्यकीर्ति का मानना है कि जिन नियमों को शिक्षा संस्थानों में इक्विटी और फेयरनेस बढ़ाने के लिए लाया गया है, वे व्यवहारिक स्तर पर कई सवाल खड़े करते हैं। उनके अनुसार, ऐसा प्रतीत होता है कि ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया में गहराई से विचार नहीं किया गया। कई सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताएं, जो छात्रों के जीवन को सीधे प्रभावित करती हैं, नियमों में जगह ही नहीं पा सकीं।

यह भी पढ़ें: यूजीसी क्या है, उच्च शिक्षण संस्थानों में इसकी भूमिका और जिम्मेदारियां क्या-क्या हैं?

पूर्वोत्तर के छात्रों की अनदेखी

उन्होंने खास तौर पर दिल्ली जैसे महानगरों में पढ़ने वाले पूर्वोत्तर भारत के छात्रों का उदाहरण दिया। विकास सर ने कहा कि नियमों की प्रस्तावना में भले ही 'नस्ल' और 'जन्म स्थान' जैसे शब्दों का उल्लेख है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे अलग है। यदि नागालैंड, मिजोरम या अन्य पूर्वोत्तर राज्यों से आए छात्रों के साथ नस्ली टिप्पणियां या भेदभाव होता है, तो उस पर कार्रवाई को लेकर नियम पूरी तरह मौन हैं।

उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जिस इक्विटी कमेटी की बात की जा रही है, उसमें अलग-अलग नस्लीय पृष्ठभूमि के लोगों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है। उनके अनुसार, बिना समावेशी प्रतिनिधित्व के भेदभाव जैसे संवेदनशील मुद्दों पर निष्पक्ष निर्णय संभव नहीं है।
 

भेदभाव की परिभाषा में बताया असंतुलन

डॉ. दिव्यकीर्ति ने यह सवाल भी उठाया कि जब नियमों में भेदभाव के छह आधार धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्म स्थान और विकलांगता स्पष्ट रूप से गिनाए गए हैं, तो फिर चर्चा का केंद्र केवल ओबीसी और जनरल वर्ग के बीच का मुद्दा ही क्यों बना दिया गया?

उन्होंने तर्क दिया कि यदि जाति के आधार पर भेदभाव के लिए एक पूरा विस्तृत पैराग्राफ लिखा जा सकता है, तो फिर धर्म, लिंग, नस्ल या अन्य आधारों पर अलग-अलग और समान रूप से विस्तृत चर्चा क्यों नहीं की गई। किसी एक श्रेणी को विशेष महत्व देना बाकी श्रेणियों के साथ असमान व्यवहार जैसा प्रतीत होता है।
विज्ञापन

'बनाने वालो ने इन्हें खुद ठीक से नहीं पढ़ा'

अपने बयान में विकास दिव्यकीर्ति ने तीखे शब्दों में कहा कि ऐसा लगता है मानो नियम तैयार करने वालों ने खुद ही इन्हें ध्यान से नहीं पढ़ा। उन्होंने अंदेशा जताया कि संभव है सुप्रीम कोर्ट में किसी मामले की सुनवाई नजदीक होने के कारण यूजीसी ने जल्दबाजी में इन नियमों को मंजूरी दे दी हो।

इसके साथ ही उन्होंने भाषाई विविधता के मुद्दे को भी उठाया। उनका कहना है कि भारत जैसे बहुभाषी देश में नियम बनाते समय अलग-अलग भाषाओं और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों का सम्मान दिखना चाहिए था, जो इन नियमों में नदारद नजर आता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें