समूचा विश्व पानी की किल्लत से जूझ रहा है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं है कि अगला विश्व युद्ध सभी देश पानी के लिए लड़ेंगे। इसलिए आज लोगों में जल संचयन की जागरूकता फैलाकर पानी की आवश्यकता बताना समय की मांग है। इसके लिए सरकारें और औद्योगिक प्रतिष्ठान अब वाटर हार्वेस्टिंग / कंजर्वेशन एंड मैनेजमेंट पर ज्यादा जोर दे रही हैं, क्योंकि इन समस्याओं से निपटने के लिए वाटर मैनेजमेंट के ट्रेड प्रोफेशनल्स को ही व्यावहारिक जानकारी होती है। ऐसे प्रशिक्षित लोग पानी रीसाइकिलिंग की अच्छी समझ रखते हैं। जाहिर है लगातार बढ़ते जल संकट को कंट्रोल में लाने के लिए आगे के वर्षों में भी वाटर साइंटिस्ट, एन्वायर्नमेंट इंजीनियर, टेंड वाटर कंजर्वेशनिस्ट या वाटर मैनेजमेंट जैसे प्रोफेशनल्स की डिमांड बनी रहेगी।
हर साल यह देखने में आया है कि देश में कहीं से बारिश के मौसम में एक क्षेत्र में बाढ़ की स्थिति होती है। तो दूसरे क्षेत्रों में भयंकर सूखा होता है। इसके प्रमुख कारण है कि वर्षा जल का उचित संचयन न होना या फिर धरती से निकाले गए जल को वापस धरती में न लौटाना। वैज्ञानिक तरीके हैं, जिनमें सबसे कारगर तरीका है वाटर हार्वेस्टिंग। इसका फायदा यह होगा, कि किसानों की मानसून पर निर्भरता कम हो जाएगी और पानी के अभाव में खराब हो रही लाखों हेक्टेयर जमीन पर सिंचाई हो सकेगी । उम्मीद है कि गहराते इस जल संकट को दूर करने के लिए आने वाले समय में इस वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल निजी तौर पर भी और अधिक बढ़ेगा।
जल प्रबंधन और संरक्षण पर आधारित कई तरह के कोर्स आजकल देश के विभिन्न सरकारी और निजी संस्थानों में संचालित हो रहे हैं। जहां से आप वाटर साइंस, वाटर कंजर्वेशन, वाटर मैनेजमेंट, वाटर हार्वेस्टिंग ऐंड मैनेजमेंट नाम से एक ऐसा ही सर्टिफिकेट कोर्स संचालित हो रहा है। जिसे 10वीं के बाद किया जा सकता है। स्टूडेंट्स को बारिश के पानी को संरक्षित करने, वर्षाजल मापन तथा वाटर टेबल आदि बेसिक चीजों की जानकारी दी जाती है। अगर आप बॉयोलॉजी विषय से 12वीं पास है और इस क्षेत्र में कोई अंडरग्रेजुएट कोर्स करना चाहते हैं। तो एक्वा साइंस या वाटर साइंस में बीएससी और एसएससी कर सकते हैं।