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Dancing Girl: सिंधु सभ्यता की डांसिंग गर्ल की कहानी, क्या इसका कुछ नाम भी है? NCERT के बदलाव से चर्चा में आई

Mon, 15 Jun 2026 06:43 PM IST
Akash Kumar एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

Indus Valley's Dancing Girl: नौवीं की कला की किताब में एनसीईआरटी ने सिंधु घाटी सभ्यता की 'डांसिंग गर्ल' की मूर्ति को वस्त्र पहनाकर दिखाया। इस बदलाव के बाद से ही डांसिंग गर्ल चर्चा का विषय बनी हुई है। सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे अनमोल धरोहरों में शामिल 'डांसिंग गर्ल' की मूर्ति अपने इतिहास, निर्माण तकनीक और मुद्रा के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। 
 
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NCERT Dancing Girl Row - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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Indus Valley's Dancing Girl: सिंधु घाटी सभ्यता के पुरातात्विक अवशेषों में 'डांसिंग गर्ल' या 'नर्तकी' की मूर्ति को सबसे विशिष्ट और एतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। प्रतिमा सिंधु कालीन सभ्यता के समय निर्मित हुई थी। समकालीन अनुमानों के अनुसार यह लगभग 2600 ई.पू. (लगभग 4500 वर्ष पूर्व) की है। मूल मूर्ति नई दिल्ली के नेशनल म्यूजियम में रखी गई है।

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मूर्ति की खोज और इतिहास

यह ऐतिहासिक मूर्ति साल 1926 में प्रसिद्ध पुरातत्वविद ब्रिटिश अधिकारी अर्नेस्ट मैके (Ernest Mackay) को मोहन जोदड़ो (Mohenjo-daro) की खुदाई के दौरान मिली थी, जो वर्तमान में पाकिस्तान के क्षेत्र में स्थित है। लगभग 10.5 सेंटीमीटर (करीब 4 इंच) ऊंची यह छोटी सी मूर्ति प्राचीन धातु विज्ञान और कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

निर्माण की 'लॉस्ट-वैक्स तकनीक'

आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार, इस मूर्ति का निर्माण 'लॉस्ट-वैक्स तकनीक' (Lost-Wax Technique) यानी 'मधूच्छिष्ट विधि' के माध्यम से कांस्य (Bronze) से किया गया था। इस प्राचीन तकनीक में:
  • सबसे पहले मोम (Wax) की एक आकृति बनाई जाती थी।
  • उसके ऊपर चिकनी मिट्टी का लेप लगाया जाता था।
  • मिट्टी के सूखने के बाद उसे गर्म किया जाता था, जिससे मोम पिघलकर एक छोटे छेद के रास्ते बाहर निकल जाता था।
  • इसके बाद, उस खोखली मिट्टी के सांचे में पिघला हुआ कांस्य भरा जाता था।
  • धातु के ठंडे होकर जम जाने के बाद मिट्टी को हटा दिया जाता था, जिससे यह सुंदर आकृति तैयार होती थी।

दिलचस्प बात यह है कि यह प्राचीन धातु कला तकनीक आज भी भारत के पश्चिम बंगाल, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के कुछ क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से प्रचलित है।

मूर्ति की बनावट और सांस्कृतिक महत्व

इस मूर्ति की शारीरिक बनावट और आभूषण इतिहासकारों के लिए बेहद कौतूहल का विषय रहे हैं। मूर्ति में निम्नलिखित विशेषताएं आधिकारिक रूप से दर्ज हैं:
  • शारीरिक मुद्रा: मूर्ति की ठुड्डी थोड़ी ऊपर उठी हुई है, एक घुटना मुड़ा हुआ है और एक हाथ उसकी कमर पर टिका है।
  • आभूषण: इसके एक हाथ में कंगन या चूड़ियां पूरी ऊपरी बांह तक भरी हुई हैं, जबकि दूसरे हाथ में केवल कुछ ही कंगन दिखाई देते हैं।
  • सांस्कृतिक मूल्य: पुरातत्वविदों की एक व्याख्या के अनुसार, ठीक इसी तरह की मुद्रा भिर्राना से मिले बर्तनों के टुकड़ों पर भी पाई गई है, जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि इस मुद्रा का उस काल में कोई सांस्कृतिक मूल्य रहा होगा।

क्या इसका कोई आधिकारिक नाम है?

पुरातात्विक और आधिकारिक रिकॉर्ड्स में इस मूर्ति का कोई विशिष्ट व्यक्तिगत नाम दर्ज नहीं है। सिंधु घाटी सभ्यता की लिपि को अब तक पूरी तरह से पढ़ा नहीं जा सका है, इसलिए यह अज्ञात है कि उस समय के लोग इसे किस नाम से पुकारते थे। इतिहासकारों और विशेषज्ञों के अनुसार, यह मूर्ति त्रिभंग जैसी मुद्रा (कमर पर एक हाथ और एक पैर थोड़ा मुड़ा हुआ) में दिखाई देती है, जिसके कारण इसे 'डांसिंग गर्ल' या 'कांस्य नर्तकी' कहा गया। यही आज वैश्विक स्तर पर इसकी पहचान बन चुका है।
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वर्तमान में चर्चा में क्यों है डांसिंग गर्ल?

वर्तमान में 'डांसिंग गर्ल' की यह एतिहासिक मूर्ति मुख्य रूप से एनसीईआरटी (NCERT) की कक्षा 9 की कला शिक्षा की नई पाठ्यपुस्तक 'मधुरिमा' के कारण विवाद और चर्चा में आई है। इस किताब के पहले अध्याय में मूर्ति की जो तस्वीर प्रकाशित की गई है, उसमें इसके मूल दृश्य स्वरूप के साथ बदलाव किया गया है। तस्वीर में मूर्ति के ऊपरी हिस्से (torso) पर शेडिंग का इस्तेमाल करके उसे ढका हुआ दिखाया गया है, जिससे मूल मूर्तिकला में दिखाई देने वाले बारीक शारीरिक विवरण अस्पष्ट हो गए हैं।

इस दृश्य संशोधन पर प्रतिक्रिया देते हुए एनसीईआरटी की ही कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक समिति के पूर्व प्रमुख और विशेषज्ञ मिशेल डैनिनो सहित कई इतिहासकारों ने गहरी नाराजगी जताई है।

क्या है पूरा विवाद? समझने के लिए ग्राफिक पर क्लिक करके पढ़ें: 


विशेषज्ञों का मानना है कि एतिहासिक कलाकृतियों के मूल स्वरूप में इस तरह का बदलाव करना उन्हें गलत तरीके से प्रस्तुत करने जैसा है। उन्होंने इसे एक पुरानी औपनिवेशिक या विक्टोरियन सोच बताया है, जो प्राचीन भारतीय कला की प्रामाणिकता और ऐतिहासिक समझ के खिलाफ है।

विवाद इस बात को लेकर भी गहरा गया है कि एनसीईआरटी की ही कक्षा 6 की सामाजिक विज्ञान की किताब में इस मूर्ति को उसके मूल रूप में दिखाया गया है, जबकि कक्षा 9 की किताब में इसे बदल दिया गया। दो अलग-अलग कक्षाओं की किताबों में दिख रहे इसी विरोधाभास और इतिहास के प्रस्तुतीकरण के तरीके को लेकर इस समय अकादमिक जगत में तीखी बहस चल रही है।

एनसीईआरटी का क्या पक्ष?

NCERT के डायरेक्टर दिनेश सकलानी ने बताया, "जैसे ही यह मामला सामने आया, संबंधित विभाग को इस पर गौर करने का निर्देश दिया गया। विशेषज्ञों से बातचीत के बाद, विभाग 'डांसिंग गर्ल' की तस्वीर को उसके असली वर्जन से बदल रहा है। डिजिटल वर्शन में यह सुधार तुरंत लागू किया जा रहा है, जबकि प्रिंटेड किताबों के नए एडिशन में तस्वीर का असली वर्जन होगा।"
 
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