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शिक्षक दिवस: समय के साथ बदलता गया गुरु शिष्य का ये संबंध

Sat, 01 Sep 2018 05:42 PM IST
गरिमा गर्ग / अमर उजाला
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स्कूल में छात्रों की एक अलग ही दुनिया होती है। कोई अपने दोस्तों के लिए जाता है तो कोई अपने पेरेंट्स के डर से, किसी के लिए शिक्षा महत्वपूर्ण है तो किसी के लिए नंबरों की चाह जरूरी है। पर क्या स्कूल की उस दुनिया में सिर्फ स्टूडेंट्स का ही रोल है। जी नहीं, शिक्षक उस दुनिया का एक ऐसा किरदार है जो शिक्षा की कलम से छात्रों के जीवन में नई रोशनी लेकर आता हैं। कहने के लिए टीचर्स डे 5 सितंबर को मनाया जाता है पर देखा जाए तो छात्रों के लिए रोज टीचर्स डे होता है। स्कूल से घर आते वक्त दोस्तों के साथ टीचर्स और उनके द्वारा पढ़ाए गए विषयों पर बात की जाती है। घर पर छात्रों की शाम टीचर्स के किस्से सुनाने में निकल जाती है। यहां हम बात कर रहे हैं उन बदलावों की जो इस अनोखे रिश्ते में आए हैं।

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जानें बदलाव

“गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु गुरुर देवो महेश्वर:
गुरुर साक्षात् परम ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः”


अगर पुराने समय की बात की जाए तो गुरु-शिष्य का संबंध ऐसा नहीं था जैसा आज है। पहले गुरु-शिष्य के संबंधों को मजबूत करता था गुरु का ज्ञान, मौलिकता और नैतिक बल, उनका शिष्यों के प्रति स्नेह और ज्ञान बांटने का निःस्वार्थ भाव। सिर्फ इतना ही नहीं गुरु के प्रति पूर्ण श्रद्धा, गुरु की क्षमता में पूर्ण विश्वास तथा गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण शिष्य के महत्वपूर्ण गुणों में से एक हुआ करता था। पर अब ऐसा नहीं है। शिक्षा के लिए अनेकों साधन सामने आ गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से हो रहे परिवर्तन के कारण यह जरूरी है कि शिक्षक भी अपनी क्षमता के स्तर को निरंतर विकसित करते रहें। आज के समय में सिर्फ पद के अाधार पर किसी का आदर या सत्कार नहीं होता बल्कि ये सब अपनी योग्यता के बल पर हासिल किया जाता है। आज का छात्र जागरूक है। यदि शिक्षक छात्रों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का सही समाधान नहीं देता तो छात्र उसका सम्मान नहीं करते।

हो रहे बदलाव-
- आज के समय में ज्ञान से ज्यादा धन को महत्व दिया जाता है।
- निस्वार्थ पढ़ाना पुरानी बात थी पर अाज के समय में टीचर्स इस सोच को बहुत पीछे छोड़ आए हैं।
- शिक्षक के ज्ञान की तुलना आज किताबों के ज्ञान से की जा रही है।
- पहले छात्रों को विश्वास होता था कि शिक्षक कभी उसके साथ कुछ गलत नहीं होने देगा, पर क्या आज का छात्र ऐसा सोच सकता है?
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शायद नहीं क्योकि हमारे समाज ने हर रिश्ते को गंदा कर दिया है। आए दिन हम न जाने कितने किस्से सुनते है। कुछ ऐसे किस्से जिनके बारे में सोचने से भी डर लगता है। उत्तराखंड के ललितपुर में गुरु और शिष्य के रिश्तों को शर्मसार करने की घटना सामने आई थी तो दूसरी तरफ इटावा में हुए शिष्या के साथ रेप ने इस रिश्ते को पूरी तरह से हिला दिया था। पर इसका मतलब ये नहीं है कि सबकी सोच एक जैसी होती है। कुछ ऐसे भी लोग हैं जिनकी लोग आज तक मिसाल दिया करते हैं। जैसे -
आरुणि - एक ऐसा शिष्य जिसने गुरु द्वारा बोले वचन को आदेश मानकर टूटी मेड़ पर लेट गया, जिससे पानी दूसरी पार न जा सकें। आरुणि का शरीर सर्दी से अकड़ने लगा किंतु उसे तो एक ही धुन... गुरु की आज्ञा का पालन। इसी तरह गुरु द्रोणाचार्य और एकलव्य, जिसने दक्षणा के रूप में अपना अंगूठा अपने गुरु को दे दिया। जब बात गुरु शिष्य की आती है तो हम परशुराम और कर्ण को भी याद करते हैं, जिसने अपने आप को कीड़े से कटवा लिया पर अपने गुरु की नींद में खलन न पढ़ने दिया।

रिश्ता आज भी वहीं है बस इसके प्रति हमारी सोच बदल गई है, जिसका समय के साथ बदलना जरूरी भी था।
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