विकलांगों के लिए छूट की मांग पर क्या बोला सुप्रीम कोर्ट?
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि दिव्यांग कानून स्नातकों को प्रैक्टिस के लिए वकीलों द्वारा नियुक्त नहीं किया जाता, जिससे उनके लिए तीन साल की वकालत की शर्त पूरी करना बेहद कठिन हो जाता है। इसलिए उन्हें इस नियम से छूट दी जानी चाहिए।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि यदि कोई सुविधा दी जाती है, तो वह सभी कानून स्नातकों के लिए समान होनी चाहिए, न कि किसी एक वर्ग के लिए। अदालत ने यह भी कहा कि किसी विशेष वर्ग को छूट देने से सेवा में आने के बाद उनमें हीन भावना पैदा हो सकती है।
याचिकाकर्ता ने मध्य प्रदेश में PwD उम्मीदवारों को दी गई छूट का भी हवाला दिया, लेकिन अदालत ने देशभर में एक समान नियम लागू करने की जरूरत पर जोर दिया।
छात्रों की निराशा को भी कोर्ट ने माना
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि इस फैसले से युवा कानून छात्रों में निराशा और हतोत्साह की भावना है। अदालत ने कहा कि वह इस विषय पर छात्रों की राय भी जानना चाहती है।
कोर्ट ने कहा, "हम चाहते हैं कि सभी उच्च न्यायालय और नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज इस मुद्दे पर अपने सुझाव दें। यदि किसी तरह का बदलाव जरूरी हुआ, तो वह सभी के लिए समान रूप से किया जाएगा।"
चार हफ्ते में मांगे गए सुझाव
सुप्रीम कोर्ट ने सभी उच्च न्यायालयों को निर्देश दिया है कि इस आदेश को अपने-अपने मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष रखें। साथ ही सभी हाई कोर्ट, NLUs और लॉ कॉलेजों से कहा गया है कि वे चार सप्ताह के भीतर अपनी राय और सुझाव अदालत को भेजें।