याचिकाकर्ताओं ने जताई आपत्ति
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि सीबीएसई के 15 मई 2026 के परिपत्र के अनुसार अगले शैक्षणिक सत्र से छात्रों को तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा, जबकि कई स्कूलों में अब तक पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध नहीं हैं।
वहीं, एक संबंधित मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि यह मामला महत्वपूर्ण संवैधानिक और संघीय मुद्दों से जुड़ा है। उनका कहना था कि भाषा व्यक्तिगत पसंद का विषय है और इसे किसी पर थोपा नहीं जा सकता।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने अदालत से अनुरोध किया कि 1 जुलाई 2026 से शुरू होने वाले नए सत्र में इस नीति को लागू करने पर रोक लगाई जाए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल कोई अंतरिम आदेश जारी नहीं किया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हम देखेंगे।”
क्या है पूरा मामला?
यह याचिका दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और चेन्नई के अभिभावकों और शिक्षकों समेत 19 लोगों ने अनुच्छेद 32 के तहत दायर की है। याचिका में सीबीएसई के 15 मई 2026 के परिपत्र संख्या Acad-33/2026 को चुनौती दी गई है।
परिपत्र के अनुसार, कक्षा 9 के छात्रों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएं अनिवार्य होंगी। विदेशी भाषाएं केवल तीसरी या अतिरिक्त चौथी भाषा के रूप में पढ़ी जा सकेंगी।
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सीबीएसई ने 9 अप्रैल 2026 को स्पष्ट किया था कि तीसरी भाषा की अनिवार्यता 2029-30 सत्र तक लागू नहीं होगी। ऐसे में स्कूलों और अभिभावकों ने उसी आधार पर अपनी शैक्षणिक योजना बनाई थी, लेकिन अचानक नीति बदलने से भ्रम और अव्यवस्था पैदा हुई है।
संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप
याचिका में कहा गया है कि प्रशिक्षित शिक्षकों और उपयुक्त पाठ्यपुस्तकों की कमी के बावजूद नीति लागू की जा रही है। इसमें आरोप लगाया गया है कि यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 14, 21ए और 19(1)(जी) का उल्लंघन करता है।
याचिकाकर्ताओं ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का हवाला देते हुए कहा कि उसमें किसी भी छात्र या राज्य पर भाषा नहीं थोपने की बात कही गई है। याचिका में मांग की गई है कि 15 मई 2026 के परिपत्र को रद्द किया जाए, 9 अप्रैल 2026 की पूर्व स्थिति बहाल की जाए और मौजूदा छात्रों पर नई नीति लागू करने पर रोक लगाई जाए।