'सिर्फ औपचारिकता नहीं हो सकती यौन शिक्षा'
सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने कहा, “यह साफ दिखाता है कि अदालत के आदेश लागू नहीं किए गए हैं। यौन शिक्षा सिर्फ औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, इसमें लैंगिक संवेदनशीलता और ट्रांसजेंडर-समावेशी दृष्टिकोण भी होना जरूरी है।”
याचिका में कहा गया है कि यह कमी न केवल अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(a), 21 और 21A के तहत छात्रों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 39, 46 और 51(c) जैसे निदेशक सिद्धांतों की भी अवहेलना है। इस तरह की अनदेखी संस्थागत भेदभाव और सामाजिक कलंक को बढ़ावा देती है।
किन राज्यों पर लगा आरोप?
याचिका में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पंजाब, तमिलनाडु और कर्नाटक की पाठ्यपुस्तकों का हवाला दिया गया है, जिनमें इन विषयों को व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज किया गया है। वहीं, केरल ने आंशिक रूप से इन मुद्दों को शामिल किया है।