याचिका में संस्थानों को लेकर क्या मांग की गई है?
अधिवक्ता अश्वनी दुबे के माध्यम से दाखिल याचिका में 14 साल तक के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष शिक्षा या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के लिए उचित नियमन की मांग की गई है।
याचिका में कहा गया है कि ऐसे सभी संस्थानों के लिए पंजीकरण, मान्यता, निगरानी और निरीक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए। इसमें संविधान के अनुच्छेद 21ए को अनुच्छेद 39(एफ), 45 और 51-ए(के) के साथ पढ़ते हुए यह कदम उठाने की मांग की गई है।
अनुच्छेद 30 को लेकर याचिका में क्या कहा गया?
याचिका में संविधान के अनुच्छेद 30 को लेकर भी एक महत्वपूर्ण दावा किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह अनुच्छेद अल्पसंख्यकों को ऐसे कोई विशेष या अतिरिक्त अधिकार नहीं देता, जो अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत नागरिकों को पहले से मिले अधिकारों से अलग हों।
याचिका में अदालत से यह निर्देश देने और घोषित करने की मांग की गई है कि अनुच्छेद 30, अनुच्छेद 19(1)(जी) की ही एक विशिष्ट पुनरावृत्ति है और इससे नागरिकों को अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत मिले अधिकारों से अतिरिक्त कोई अधिकार, लाभ या विशेषाधिकार नहीं मिलता।
बच्चों को लेकर याचिका में क्या तर्क दिया गया?
याचिका में बच्चों की कम उम्र और उनकी संवेदनशीलता का हवाला दिया गया है। इसमें कहा गया है कि बच्चे देश के विकास की रीढ़ हैं। कम उम्र के कारण वे आसानी से प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए उनके प्रति राज्य की जिम्मेदारी और अधिक हो जाती है।
याचिका में कहा गया है, "याचिकाकर्ता अनुच्छेद 32 के तहत यह जनहित याचिका 14 वर्ष तक के बच्चों को धर्मनिरपेक्ष या धार्मिक शिक्षा देने वाले सभी संस्थानों के पंजीकरण, मान्यता, निगरानी और निरीक्षण के लिए दाखिल कर रहा है। यह अनुच्छेद 21ए, 39(एफ), 45 और 51-ए(के) की भावना के अनुरूप है।"
याचिका में आगे कहा गया है, "याचिकाकर्ता का कहना है कि बच्चे राष्ट्र के विकास की रीढ़ हैं और कम उम्र के कारण वे भोले और आसानी से प्रभावित होने वाले होते हैं। इसलिए राज्य की उनके प्रति जिम्मेदारी बढ़ जाती है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है, क्योंकि देश का भविष्य बनने वाले छोटे बच्चों को अपंजीकृत संस्थानों में प्रभावित या अपने अनुसार ढाला जा सकता है।"
उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे इलाकों में क्या मिला?
उपाध्याय ने अपनी याचिका में दावा किया है कि उन्होंने उत्तर प्रदेश की सीमा से लगे कई जिलों का दौरा किया। उनके अनुसार, इन इलाकों में कई ऐसे संस्थान मिले जो कथित तौर पर पंजीकृत या मान्यता प्राप्त नहीं थे।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि देश के सीमावर्ती इलाकों में बिना पंजीकरण और मान्यता वाले संस्थानों की संख्या बढ़ रही है। उनका कहना है कि इन संस्थानों पर प्रभावी निगरानी या नियामक व्यवस्था नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा मंत्रालय के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग के सचिव टीके अनिल कुमार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है। अब मामले में आगे की सुनवाई सचिव की ओर से दाखिल किए जाने वाले जवाब के आधार पर होगी।