फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सुप्रीम कोर्ट का फैसला: 7वीं-8वीं की तरह छठी में भी तीसरी भाषा पर राहत, 10वीं में नहीं होगी इसकी बोर्ड परीक्षा

Mon, 28 Sep 2026 03:38 PM IST
आकाश कुमार एएनआई, नई दिल्ली

सार

Supreme Court: सीबीएसई की तीन-भाषा व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने छठी कक्षा के छात्रों को बड़ी राहत दी है। अब उन्हें सातवीं कक्षा के छात्रों की तरह तीसरी भाषा में बोर्ड परीक्षा से छूट मिलेगी। कोर्ट ने स्कूलों की दिक्कतों पर भी जवाब मांगा है। जानें पूरा मामला...
 
विज्ञापन
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

CBSE Third Language Policy: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को निर्देश दिया कि तीन-भाषा व्यवस्था के तहत छठी कक्षा के छात्रों को भी वही राहत दी जाए, जो अभी सातवीं कक्षा के छात्रों को मिल रही है। यह मामला सीबीएसई की तीन-भाषा नीति को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सामने आया।

विज्ञापन


मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ मामले की सुनवाई कर रही थी। अदालत ने कहा कि छठी कक्षा के छात्रों को भी तीसरी भाषा के मूल्यांकन में सातवीं कक्षा के छात्रों के लिए दी गई छूट का लाभ दिया जाए।

छठी कक्षा के छात्रों को क्या राहत मिली?

अदालत के आदेश का सबसे अहम हिस्सा तीसरी भाषा के मूल्यांकन से जुड़ा है। अभी सातवीं, आठवीं और नौवीं कक्षा के छात्रों को संक्रमणकालीन राहत दी गई है। इसके तहत जब वे दसवीं कक्षा में पहुंचेंगे, तो तीसरी भाषा की सीबीएसई बोर्ड परीक्षा नहीं होगी।

तीसरी भाषा का मूल्यांकन स्कूल स्तर पर आंतरिक रूप से किया जाएगा। इसका दसवीं कक्षा के बोर्ड परिणाम पर पास या फेल होने का असर नहीं होगा। अब यही राहत छठी कक्षा के छात्रों को भी दी गई है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि छठी कक्षा के छात्रों को सातवीं कक्षा के छात्रों को दी गई वही छूट दी जाए।

मुख्य न्यायाधीश ने सुनवाई के दौरान संकेत दिया, "पास या फेल नहीं होगा। केवल उपस्थिति प्रमाणपत्र होगा।"

 

सरकार ने तीन-भाषा व्यवस्था पर क्या कहा?

सुनवाई की शुरुआत में भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि छठी कक्षा के छात्रों को मौजूदा शैक्षणिक वर्ष से ही इस व्यवस्था में शामिल करने को लेकर सरकार अदालत को इसके पक्ष में समझाने का प्रयास करेगी।

उन्होंने बताया कि कुल 28,819 स्कूलों में से करीब 1.2 प्रतिशत स्कूलों को छोड़कर बाकी स्कूल व्यवस्था के अनुरूप हैं। उनके अनुसार किताबें और अध्ययन सामग्री उपलब्ध हैं और छात्रों ने इस व्यवस्था को अपनाया है।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने अदालत को बताया कि सातवीं, आठवीं और नौवीं कक्षा के छात्रों को पहले ही संक्रमणकालीन राहत दी जा चुकी है। इसके तहत दसवीं कक्षा में तीसरी भाषा की कोई बोर्ड परीक्षा नहीं होगी।
 

याचिकाकर्ताओं ने क्या आपत्ति जताई?

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने कहा कि छात्रों ने इस व्यवस्था का पालन इसलिए किया, क्योंकि उनके पास दूसरा विकल्प नहीं था। उन्होंने कहा कि शुरुआत में पाठ्यपुस्तकें ऑनलाइन उपलब्ध नहीं थीं।

उन्होंने यह भी बताया कि सीबीएसई से करीब 28.83 लाख छात्र जुड़े हैं। उनका कहना था कि भारतीय स्कूल प्रमाणपत्र परीक्षा परिषद (आईसीएसई) और राज्य बोर्ड बीच पढ़ाई कर रहे बच्चों पर ऐसी ही व्यवस्था लागू नहीं कर रहे हैं। उन्होंने छठी कक्षा के लिए इस नीति को कम से कम 2027 तक टालने की मांग की।

अंग्रेजी को गैर-मातृ भाषा मानने पर भी सवाल

सुनवाई के दौरान एक वकील ने अंग्रेजी को गैर-मातृ भाषा के तौर पर रखे जाने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि इसके कारण कुछ छात्रों को पहले से पढ़ी जा रही कई विदेशी भाषाओं को छोड़ना पड़ रहा है।

उन्होंने सवाल उठाया कि जब संविधान अंग्रेजी में लिखा गया है और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही भी अंग्रेजी में होती है, तो अंग्रेजी को गैर-मातृ भाषा कैसे माना जा सकता है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत इस मुद्दे पर विचार करेगी। पिछली सुनवाई में भी अदालत ने अंग्रेजी को लेकर इस व्यवस्था के तर्क पर सवाल उठाया था।

छात्रों और स्कूलों की कौन-कौन सी दिक्कतें सामने आईं?

सुनवाई के दौरान वकीलों ने तीन-भाषा व्यवस्था से जुड़ी कई व्यावहारिक समस्याएं अदालत के सामने रखीं। इनमें छात्रों पर पढ़ाई का अतिरिक्त दबाव, स्कूलों में जरूरी ढांचे की कमी और भाषाओं के सीमित विकल्प जैसे मुद्दे शामिल थे।

कुछ मामलों में केवल हिंदी और संस्कृत के विकल्प उपलब्ध होने की बात भी कही गई। ग्रामीण इलाकों में छात्रों को किताबें हासिल करने में परेशानी का मुद्दा भी उठाया गया।

कक्षा नौ के एक छात्र के अभिभावक की ओर से पेश वकील ने कहा कि ऑनलाइन पाठ्यपुस्तकें पर्याप्त नहीं हैं। इस पर न्यायमूर्ति मोहना ने कहा कि कोविड के दौरान बच्चों ने मोबाइल फोन के जरिए पढ़ाई की थी और उन्होंने नीति के खिलाफ बेहतर कारण बताए जाने की बात कही।

वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद ग्रोवर ने भाषाओं के सीमित विकल्प का मुद्दा उठाते हुए पूछा कि अगर कोई छात्र पंजाबी सीखना चाहता है तो उसके पास क्या विकल्प होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने स्कूलों के लिए क्या निर्देश दिया?

अदालत ने कहा कि सीबीएसई बाकी स्कूलों तक पहुंचने के लिए एक अधिकारी नियुक्त करे। यह अधिकारी उन स्कूलों की दिक्कतों का पता लगाएगा, जो अभी इस व्यवस्था के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाए हैं।

अदालत के आदेश में दर्ज किया गया कि 99 प्रतिशत स्कूलों में जरूरी ढांचा उपलब्ध है, जबकि 1.2 प्रतिशत स्कूलों में अभी सुविधाएं तैयार की जानी बाकी हैं। न्यायमूर्ति बागची ने यह भी कहा कि अगर किसी स्कूल ने आंतरिक मूल्यांकन में किसी छात्र को रोक दिया, तो अदालत इस मामले में हस्तक्षेप करेगी।
विज्ञापन

अब मामले में आगे क्या होगा?

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीएसई को चार सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ताओं की ओर से जवाब दाखिल किया जाएगा। मुख्य मामला आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें