तीस वर्षीय निशा गुप्ता मुंबई के भायंदर में अपने पति और ससुराल के अन्य सदस्यों के साथ रहती हैं। निशा की जिंदगी बहुत उठा पटक वाली रही है और उन्होंने जिंदगी की हर परेशानी का डटकर सामना किया। निशा ऐसा इसलिए कर सकीं, क्योंकि वे मानसिक रूप से मजबूत थीं। निशा ने निश्चय किया था कि वह अपनी शारीरिक अक्षमता को खुद की कमजोरी नहीं बनने देंगी और उनका यही दृढ़-विश्वास था कि वह आज एक अच्छी पैराप्लेजिक (पैरों या शरीर के निचले हिस्से से अक्षम) खिलाड़ी हैं।
निशा आज राष्ट्रीय स्तर की अच्छी तैराक हैं और साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर की बास्केट बॉल खिलाड़ी भी। उन्होंने तैराकी में राज्य स्तरीय तीन स्वर्ण पदक और राष्ट्रीय स्तर के तीन कांस्य पदक जीते हैं। निशा ने 2015 में दिल्ली में हुए द्वितीय व्हीलचेयर बास्केटबॉल प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता था। यह पहला मौका था, जब वह किसी खेल प्रतियोगिता में भाग ले रही थीं। निशा ने 2017 में अंतरराष्ट्रीय बाली प्रतियोगिता में तृतीय स्थान हासिल किया था। इस समय निशा महाराष्ट्र की महिला व्हीलचेयर बास्केटबॉल टीम के लिए खेलती हैं। इस टीम ने 2017 में राष्ट्रीय स्तर पर चौथा स्थान हासिल किया था। निशा को महिला दिवस पर उनकी उपलब्धियों के लिए सुधा चंद्रन द्वारा सम्मानित किया गया था।