बंगाल के पुरुलिया में जन्में विक्की गरीब परिवार से ताल्लुक रखते थे। उस अभाव भरे जीवन में भी उन्होंने एक बेहतर जिंदगी के ख्वाब को जिंदा रखा और सोलह साल की उस छोटी उम्र में घर से भाग गये।
घर से भागकर वे दिल्ली आये। सिमेंट लाने के लिए दिये गये 800 रुपये दिल्ली आकर जल्द ही खत्म हो गये। वापस जाने से बेहतर उन्हें कूड़ा बीनना ज्यादा सही लगा।
पर बदमाशो ने वह भी छीन लिया। उसके बाद विक्की ने 50 रुपये में एक ढाबे पर बर्तन माजना शुरु किया। एक महिला की मदद से विक्की को एक ठिकाना मिला। सलाम बालक ट्रस्ट नाम की एक एनजीओ ने उसे आसरा दिया।