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स्लम में रहने वाले जुड़वा भाइयों ने परीक्षा में किया टॉप

Mon, 20 Mar 2017 06:10 PM IST
amarujala.com- Presented by: शिवेंदु शेखर
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विनय और विपिन गुप्ता
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मुंबई के सांताक्रूज के पास एक स्लम में रहता है विनय गुप्ता और विपिन गुप्ता का परिवार। परिवार गरीबी में जी रहा है लेकिन जब कोई अच्छी खबर आती है तो खुशी चौल की उन दीवारों से बाहर हिलोरें मारने लगती है। 
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पिछले 4 सालों से प्रतिदिन दोनों जुड़वा भाई अपने घर से सुबह 6 बजे निकलते और फिर बस, ट्रेन और रिक्शे से होते हुए अपने कॉलेज अंजुमन-ए-इस्लाम कालसेकर टेक्निकल कैंपस, पनवेल पहुंचते थे। फिर शाम में इतनी ही मशक्कत के बाद वापिस घर तक का सफर होता था। बावजूद इसके ये न कभी लेट होते थे और न ही कभी कोई क्लास मिस करते थे। 
 

दोनों भाइयों ने किया टॉप

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक जब इनके इंजीनियरिंग फाइनल इयर का रिजल्ट आया दोनों भाइयों ने टॉप के दो पोजीशन अपने नाम कर लिए। जहां विपिन ने पूरे कॉलेज के सभी विभागों में नंबर एक के पोजीशन को फतह किया वहीं विनय ने दूसरा स्थान अपने नाम कर लिया। 

कॉलेज के डायरेक्टर डॉ। अब्दुल रज्जाक ए होंनुतागी कहते हैं, "दोनों भाइयों ने शानदार परफॉरमेंस किया है और हमें गर्व है कि हमें ऐसे बच्चों को गाइड करने का मौका मिला।" 

घर में पिता वेदमनी एक कंस्ट्रक्शन साईट पर लेबर कॉंट्रेक्टर का काम करते हैं जबकि मां एक हाउस वाइफ हैं। घर में गरीबी होने के बावजूद भी पढ़ने लिखने का माहौल रहा है। 5 भाई-बहनों में सबसे बड़ी राधिका एक लैब तकनीशियन हैं, रेणुका केमिस्ट्री में ग्रेजुएट हैं वहीं बड़ा भाई किसी आईटी फर्म के लिए काम करता है। 

पिता वेदमनी इस सब का पूरा श्रेय अपनी पत्नी और इनकी मां को देते हुए कहते हैं कि, "मुझसे ज्यादा इनकी मां ने मेहनत किया है ये देखने के लिए कि मेरे सभी बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले।" 

1984 में वेदमनी जो कि यूपी के बस्ती के रहने वाले हैं मुंबई आ गए थे। मुंबई आने के बाद वेदमनी ने कंस्ट्रक्शन साईटों पर लेबर का काम किया और अब लेबर कॉंट्रेक्टर हैं। 
 
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सिविल इंजीनियर बनना चाहते हैं दोनों

मुश्किलें इतनी ही नहीं थी, चौल में रहना, भीड़-भाड़ की जगह, पानी की कमी इस सब के बाद भी इन लड़कों ने मेहनत से सब कुछ हासिल किया। मां की आंखें बोलते हुए नम हो जाती हैं कि कई बार मैं इनसे कहती कि बहुत रात हो गई है अब सो जाओ लेकिन ये बच्चे रात-रात भर पढ़ाई करते। 

पिता कहते हैं कि मैंने कंस्ट्रक्शन साइट पर काम किया है और मैंने देखा है वहां सिविल इंजीनियर की कितनी इज्जत होती है। मरी इच्छा थी कि ये भी सिविल इंजीनियर बनें और इन बच्चों ने भी रुची दिखाई। 

बच्चों का भी सपना है कि परिवार के लिए एक घर हो। जिसमें अलग से बाथरूम और किचन की सुविधा हो। मां-बाप के लिए अलग से एक कमरा हो, डाइनिंग हॉल हो वो सब कुछ हो जो अब तक इन्हें नहीं मिल पाया हमें पढ़ाने तैयार करने के चक्कर में।
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