मैंने किसी तरह उन्हीं बैगों का प्रबंध करके बांध के लिए प्रयोग किया। जेसीबी की मदद से इन बैगों में मिट्टी भरकर हमने प्राकृतिक जल स्रोत में पहुंचाया। इसका नतीजा यह निकला कि जल स्रोत का स्तर ऊपर आ गया, जिससे हमारे बनाए चेक डैम में पानी इकट्ठा हो गया और आखिर वह दिन आ ही गया, जब हमने अपने गांव में एक बांध का निर्माण कर लिया। हमने बांध में करीब पचास लाख लीटर पानी इकट्ठा किया। यह गांव के किसानों को अप्रैल तक की पानी की जरूरतों का निश्चित बंदोबस्त था।
जल संग्रह का यह एक पुराना परंपरागत तरीका है, जिसे समय के साथ भुला दिया गया है। इस पूरे प्रकल्प में करीब चौदह हजार रुपयों का खर्च आया, जिससे पंद्रह परिवारों को फायदा पहुंचा। जब मेरा प्रयास सफल हो गया, तो दूसरे किसानों को भी मुझपर भरोसा हो गया और उन्होंने मेरे साथ हाथ मिला लिया, जिसका यह नतीजा निकला कि प्रति परिवार कई हजारों का खर्च घटकर मात्र आठ सौ रुपये पर आ गया।
जिस तरह मैंने पड़ोस के गांव को देखकर अपने गांव के बारे में सोचा, उसी तरह अब हमारे गांव की तरकीब देखकर हमारे दूसरे पड़ोसी गांव इस तरीके के बांध का फायदा उठा रहे हैं। वहां के किसान हमारे गांव में आकर बांध का निरीक्षण करते हैं। यही नहीं, जिला पंचायत के अधिकारी भी हमारे प्रयासों से प्रभावित हुए हैं।
उन्होंने भी मनरेगा योजना के तहत इसी तरह के एक हजार पारंपरिक कट्टे विकसित करके जिले की पानी की समस्या खत्म करने की दिशा में पहल की है। बांध बनाकर मैंने अपने गांव वालों का दिल जीत लिया है। मेरे प्रति उनकी कृतज्ञता देखकर मुझे जो खुशी मिलती है, उसे मैं बयान नहीं कर सकता। मेरा बांध अस्थायी है, लेकिन मैं कोशिश करूंगा कि अगले वर्ष और बेहतर बांध बनाकर अपने परिवार समेत गांव के किसानों का भला कर सकूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।