भारत की आजादी के तीन साल बाद मेरा जन्म बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) में हुआ था। कुछ ही वर्षों बाद अपने परिवार के पलायन के फैसले की वजह से मैं भारत आ गया और शरणार्थी के रूप में यहीं रहने लगा। बचपन से ही मैं तमाम तरह के काम करने लगा। पढ़ाई के बारे में तो सोच भी नहीं सकता था।
थोड़ा बड़ा हुआ, तो परिस्थितिवश नक्सलियों के संपर्क में आ गया। पुलिस द्वारा पकड़ा गया, जेल भी हुई। जेल में ही एक साथी की मदद से पढ़ना सीख गया। वहां से छूटने के बाद रिक्शा चलाने का काम करने लगा और इसी दौरान उपन्यास-कहानी का चस्का लग गया। अनिश्चितता के भंवर से शुरू मेरी जिंदगी के सफर को एक शब्द का अर्थ जानने की उत्सुकता ने एक ऐसा मोड़ दिया, जिस पर विश्वास करना मुश्किल है।
महाश्वेता जी से परिचय के बाद मैंने लेखन शुरू कर दिया। अगले कुछ हफ्तों में मैंने उन्हें बीस पृष्ठों की एक कहानी लिखकर दी। अस्सी के दशक के उस दौर में मेरी कहानी महाश्वेता देवी की प्रतिष्ठित पत्रिका वर्तिका में छपी, जिसका शीर्षक था- 'मैं रिक्शा चलाता हूं।' उसके बाद मैंने लघु कहानियां, उपन्यास और अनेक निबंध लिखे। मेरी सभी रचनाएं वंचित वर्ग के संघर्ष को दर्शाती हैं। दो दशक पहले ही मैंने रिक्शा चलाना बंद कर दिया था और खुदीराबाद आ गया।
एक विकलांग विद्यालय में मैं अपने सहयोगियों के साथा हर रोज तीन सौ छात्रों के लिए खाना पकाता हूं। जी हां, यह भी मेरा काम है, लेकिन मैं चाहता हूं कि मैं एक दलित लेखक के रूप में जाना जाऊं। कई साहित्यिक आलोचकों ने मुझे अपने मंच पर बंगाली दलित लेखक के तौर पर बुलाना शुरू कर दिया है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।