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Success Story: किसान परिवार से निकले विकास नाहर, सूखे मेवों ने दिलाई पहचान; अब खड़ा किया 500 करोड़ का कारोबार

Mon, 19 Jan 2026 08:30 AM IST
शिवम गर्ग न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

एक किसान परिवार में पैदा हुए हैप्पिलो के संस्थापक व सीईओ विकास धनमल नाहर ने 20 से अधिक असफलताओं और पेट पालने के लिए किए गए छोटे-मोटे कामों के बावजूद, हार नहीं मानी। मात्र 10 हजार रुपये और दो कर्मचारियों के साथ शुरू हुई उनकी कंपनी 'हैप्पिलो' आज 500 करोड़ का साम्राज्य बन चुकी है।
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विकास डी नाहर - फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
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यह प्रेरणादायी कहानी है कर्नाटक के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे एक युवा की, जिसे अपनी मंजिल तक पहुंचने से पहले बीस से भी ज्यादा बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। कई बार तो हालात ऐसे बने कि पेट पालने के लिए उसे छोटे-मोटे काम भी करने पड़े। पर उसने कभी खुद को और अपने सपने को टूटने नहीं दिया।
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आखिरकार, कई ठोकरों के बाद उसने अपनी एक छोटी-सी कंपनी शुरू की। कारोबार धीरे-धीरे संभल ही रहा था कि कोरोना महामारी ने उस पर ब्रेक लगा दिया। गोदाम में लाखों का माल पड़ा रह गया। वह युवा जब जरूरी सप्लाई की अनुमति के लिए कमिश्नर के पास पहुंचा, तो उसे जवाब मिला कि ड्राई फ्रूट्स जरूरी सामान की सूची में नहीं आते। अब उसके सामने सबसे बड़ा सवाल था कि कर्मचारियों को वेतन कैसे मिलेगा? लेकिन यहीं उसने हार मानने के बजाय अपनी सोच बदलने का फैसला किया। ई-कॉमर्स को अपनाया और अपने उत्पाद ऑनलाइन बेचने शुरू किए। यही फैसला उसकी किस्मत का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ।

लगातार मेहनत, सही रणनीति और कभी न हार मानने वाली सोच के दम पर सिर्फ 10 हजार रुपये से शुरू हुई उसकी कंपनी आज 500 करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार कर रही है। हम बात कर रहे हैं हैप्पिलो के संस्थापक और सीईओ विकास धनमल नाहर की, जो हमें सिखाते हैं कि सपने टूटने से नहीं, छोड़ देने से मरते हैं।
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एक फैसले ने बदली दिशा
वर्ष 1984 में जन्मे विकास के परिवार की आजीविका कॉफी और काली मिर्च की खेती से चलती थी। खेती-किसानी से ही उन्होंने धैर्य और संघर्ष का पहला पाठ सीखा। उनके पिता धनमल नाहर कॉफी और काली मिर्च का व्यापार भी करते थे, इससे विकास को बचपन से ही व्यापार की बुनियाद समझ मिलने लगी थी। विकास ने शुरुआती पढ़ाई गांव के स्कूलों से ही पूरी की। सीमित संसाधनों के बावजूद आगे की पढ़ाई के लिए वह बंगलूरू यूनिवर्सिटी पहुंचे और वर्ष 2005 में कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन पूरा किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने एक बड़ी कंपनी में तीन वर्षों तक वरिष्ठ आयात प्रबंधक (एशिया) के रूप में काम किया। एक स्थिर नौकरी के बावजूद विकास संतुष्ट नहीं थे, क्योंकि वह अपनी पहचान खुद बनाना चाहते थे। इसलिए, उन्होंने नौकरी छोड़ दी और अपने सपनों को सही दिशा देने के लिए सिम्बायोसिस यूनिवर्सिटी से एमबीए करने का निर्णय लिया। यहीं से उनके उद्यमी बनने की यात्रा शुरू हुई।

सीखे हुए सबक आए काम
एमबीए के दौरान कैंपस प्लेसमेंट के जरिये विकास का चयन एक नामचीन बैंक में हुआ। हालांकि, उन्होंने महज छह महीने बाद ही नौकरी छोड़ दी। इसके बाद उन्होंने एक स्टार्टअप में लगभग साढ़े चार साल तक प्रबंध निदेशक के रूप में काम किया। यह कंपनी सेहत से जुड़े उत्पादों, जैसे सूखे मेवे आदि, पर केंद्रित थी। यहीं पर हासिल किए अनुभव और सबक ने उन्हें व्यापार के लिए पूरी तरह तैयार किया। अंततः उन्होंने अपना खुद का व्यवसाय शुरू करने का निर्णय लिया।
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दो कर्मचारियों के साथ शुरू हुआ सफर
भले ही विकास को व्यवसाय की समझ विरासत में मिली थी, लेकिन खुद की कंपनी हैप्पिलो शुरू करने में उन्हें बीस से ज्यादा बार असफलताओं का सामना करना पड़ा। जब वह अपने विचार लेकर निवेशकों के पास जाते, तो हर बार निराशा ही हाथ लगती। इस संघर्ष के दौर में उन्होंने खुदरा विक्रेता और वितरक के रूप में भी काम किया। जब निवेशकों ने हाथ पीछे खींच लिए, तो अपनी जमापूंजी के महज 10 हजार रुपये और दो कर्मचारियों के साथ विकास ने हैप्पिलो की शुरुआत की। बाद में उनकी पत्नी ने 20 लाख रुपये का लोन लेकर निवेश किया। कुछ समय बाद सरकार की सीजीटीएमएसई योजना के तहत 75 लाख रुपये की सहायता मिली, जिसने कंपनी को आगे बढ़ने की मजबूत नींव दी।

विकास की उड़ान
आज हैप्पिलो केवल एक ब्रांड नहीं, बल्कि भारतीय उद्योग जगत में एक प्रेरक मिसाल बन चुका है। 40 से अधिक किस्मों के पैकेटबंद सूखे मेवे, 100 से ज्यादा चॉकलेट वैरायटी और 60 से अधिक मसालों के साथ कंपनी ने सेहत और स्वाद, दोनों में अपनी अलग पहचान बनाई है। आज 500 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर रही यह कंपनी दूरदर्शी नेतृत्व और नवाचार की मिसाल है। पांच भाषाओं में दक्ष विकास की वैश्विक दृष्टि और निरंतर सीखने की ललक उन्हें भीड़ से अलग खड़ा करती है। ‘शार्क टैंक इंडिया’ में मौजूदगी, फोर्ब्स और टाइम्स की ‘40 अंडर 40’ सूची में स्थान और अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार विकास के धैर्य और मेहनत का प्रमाण हैं।

युवाओं को सीख
  • असफलताओं से घबराने के बजाय उनसे सबक लेना चाहिए।
  • बड़े सपने देखें, लेकिन शुरुआत छोटी करने से न डरें।
  • धैर्य और निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजी हैं।
  • दूरदर्शिता और आत्मविश्वास से ही स्थायी सफलता मिलती है।
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