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गरीबी के कारण बचपन में छोड़ना पड़ा था स्कूल, रिक्शा चलाकर खोल डाले 9 स्कूल

Mon, 26 Feb 2018 01:57 PM IST
अहमद अली
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Ali Ahmad
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मैं असम के करीमगंज जिले के मधुरबोंद गांव में रहने वाला एक रिक्शा चालक हूं। मैं पढ़ना चाहता था, लेकिन गरीबी के कारण बचपन में मुझे स्कूल छोड़ना पड़ा। पेट की भूख शांत करने के लिए किताबों की दुनिया से दूर होने पर मुझे बहुत पीड़ा हुई। मगर इसी पीड़ा के एहसास के बाद मैंने तय कर लिया था कि मैं भविष्य में कुछ ऐसा करूंगा कि मेरे गांव का कोई भी बच्चा पैसे के अभाव में पढ़ाई से वंचित न रहे।

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परिवार पालने के लिए मैं शुरू से ही रिक्शा चला रहा हूं। रिक्शा चलाने से हासिल होने वाली आमदनी से बमुश्किल भूख मिट पाती थी। कमाई ऐसी नहीं थी, जिससे जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाने का अपना सपना साकार कर सकूं। लोगों से चंदा इकट्ठा करके भी कोई स्कूल नहीं खोला जा सकता था। इन्हीं परिस्थितियों के मद्देनजर 1978 में मैंने अपनी जमीन का एक छोटा-सा टुकड़ा बेचने का निर्णय किया।

जमीन के बदले मिले पैसे और कुछ दूसरे इंतजामों की मदद से आखिरकार मैंने गांव में स्कूल खोल दिया। अपने गांव-मोहल्ले के बच्चों की शिक्षा के लिए यह स्कूल बहुत उपयोगी रहा। लेकिन मैंने देखा कि आसपास के कई दूसरे इलाके हैं, जहां और स्कूलों की जरूरत है। फिर मैंने उन इलाकों में भी स्कूल स्थापित करने के लिए अपने प्रयास शुरू कर दिए। कुल दस स्कूल खोलने का लक्ष्य लेकर मैं आगे बढ़ता रहा।
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इस बीच अनेक तरह की चुनौतियां आईं, लेकिन इस परोपकारी काम के लिए कुछ सरकारी सहायता, तो कुछ लोगों की भलमनसाहत से मैंने अब तक नौ स्कूलों का सेटअप तैयार कर दिया है, जिनमें तीन स्कूलों को सरकारी मान्यता प्राप्त हो चुकी है, जबकि दूसरे प्रक्रिया में हैं। केवल एक संकल्प से शुरू हुआ मेरा सफर इतना असरदार होगा, यह मैंने भी नहीं सोचा था। अब मैंने अपना लक्ष्य और भी बड़ा कर लिया है।

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मैं चाहता हूं कि अपने इलाके मैं एक कॉलेज का निर्माण कराऊं, जिससे इलाके के लोग साक्षर होने के साथ उच्च शिक्षा भी हासिल कर सकें। वैसे भी मैंने महसूस किया है कि निरक्षरता एक तरह का पाप है और यह सभी बीमारियों का मूल कारण है।

शिक्षा की कमी के कारण अधिकांश परिवारों को विभिन्न तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। गरीबी के कारण भले ही मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ी हो, लेकिन मुझे खुशी है कि मैंने अपने बच्चों समेत आसपास के सभी बच्चों के लिए इतना इंतजाम कर दिया है कि उनके साथ ऐसा न हो।

हालांकि पत्नी समेत सात बच्चों के परिवार की जिम्मेदारी के साथ अपने सपने को साकार कर पाना मेरे लिए आसान कभी नहीं रहा। बावजूद इसके मैंने अब तक किसी भी स्कूल का नाम खुद के नाम से नहीं जोड़ा। बस एक हाई स्कूल का नाम मेरे नाम पर है, वह भी गांव वालों के विशेष आग्रह की वजह से। शिक्षा के लिए की गई मेरी मेहनत का नतीजा देर से ही सही, पर दिखने लगा है।

कुछ ही समय पहले इलाके के विधायक ने सरकारी योजना के अंतर्गत मेरे हाई स्कूल के विकास के लिए ग्यारह लाख रुपये की मदद की घोषणा की है।
मैं बूढ़ा हो रहा हूं, लेकिन आज भी रिक्शा खींचता हूं। मैं चाहता हूं कि अपनी आखिरी सांसों तक मैं अपने सपने को और विस्तृत करता रहूं।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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