फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Success Story: एक हादसे में गंवाए दोनों हाथ लेकिन नहीं मानी हार और किया ये बड़ा काम

Fri, 29 Dec 2017 08:49 AM IST
मालविका अय्यर
विज्ञापन
Malvika Iyer
विज्ञापन
मई, 2002 की छब्बीस तारीख। उस दिन सबकी छुट्टी थी, रविवार का दिन था। मैं नवीं कक्षा में थी। मम्मी-पापा सभी लोग घर पर थे। कुछ मेहमान उनसे मिलने आए थे। पापा मेहमानों के साथ बैठक कक्ष में बैठे थे। मेरी बहन उनके लिए रसोई में चाय बना रही थी। गर्मी बढ़ गई थी, सो मां कूलर में पानी भरने गई हुई थीं। तभी मेरी नजर अपनी जींस की फटी जेब पर गई।
विज्ञापन


मैंने सोचा, क्यों न इसे फेवीकॉल से चिपका दूं! यह सोचकर मैं गैराज में किसी भारी वस्तु की तलाश में चली गई, जिससे चिपकाने के बाद जींस पर भार रखा जा सके। मेरे घर के पास ही सरकारी गोला-बारूद डिपो था। मुझे नहीं पता था कि हाल में ही उस डिपो में आग लगी है, जिससे डिपो में रखे कई विस्फोटक पदार्थ आसपास के इलाके में बिखर गए हैं।

पढ़ें: Success Story: अमेरिका से लौटकर जीता चुनाव और टॉप 100 लोकप्रिय महिलाओं में शामिल

गैराज में भारी वस्तु की तलाश में मैं एक ग्रेनेड बम उठा लाई। उसका प्रयोग करने से पहले उसके बारे में मैं कुछ समझ पाती कि ग्रेनेड फट गया। एक पल में ही मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। मुझे अस्पताल पहुंचाया गया। युद्धस्तर पर इलाज चला। मेरी जान तो बच गई, पर उस हादसे की वजह से मैंने अपने दोनों हाथ गंवा दिए। साथ ही दोनों पैर भी बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गए।
विज्ञापन


मुझे दो साल तक अस्पताल में रहना पड़ा। इस दौरान मुझे कई स्तर की सर्जरी से गुजरना पड़ा। मैं महीनों तक चल भी न सकी। मैं एक झटके में दुनिया की नजर में सामान्य से दिव्यांग बन चुकी थी।
मेरा जन्म तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था, पर मेरी परवरिश राजस्थान के बीकानेर में हुई है। जिंदगी भर याद रहने वाले उस हादसे के बाद मैंने हिम्मत नहीं हारी और पढ़ना जारी रखा।
विज्ञापन

मालविका अय्यर
मैंने चेन्नई माध्यमिक स्कूल परीक्षा में बतौर प्राइवेट अभ्यर्थी हिस्सा लिया और सहायक की मदद से परीक्षा अच्छे नंबरों से पास की। मेरा हौसला बढ़ चुका था। मैं आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली आ गई और यहां के सेंट स्टीफन कॉलेज से अर्थशास्त्र में ऑनर्स की डिग्री ली। इस बीच सामाजिक कामों में मेरी रुचि बढ़ने लगी थी। यही कारण रहा कि मैंने दिल्ली स्कूल से एमएसडब्ल्यू और मद्रास स्कूल से एम. फिल की पढ़ाई पूरी की।

बिना हाथों के ही पढ़ाई का यह बुखार जब मुझ पर चढ़ा था, तभी मुझे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से मिलने के लिए राष्ट्रपति भवन की ओर से आमंत्रण भी मिला था। किसी ने सच ही कहा है कि, गलत मनोभाव ही जीवन की एकमात्र विकलांगता है। मेरे मन में एक अलग प्रकार की उम्मीद जिंदा थी। मुझे पक्का भरोसा था कि मेरा शरीर भले ही अधूरा हो गया हो, पर इससे मेरी जिंदगी की पूर्णता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

इस हालत में भी सामाजिक सरोकारों के लिए मेरा हौसला देखकर मुझे कई विदेशी संस्थाओं से अपने यहां मोटिवेशनल स्पीच (प्रेरक भाषण) देने के लिए बुलाया जाने लगा। संघर्ष भरे दिनों में मां की कही वह बात मुझे हमेशा याद रहेगी, जब उन्होंने कहा था, आईने के सामने खड़ी होकर मुस्करा के देखो, तुम्हें अपनी सूरत दुनिया में सबसे सुंदर दिखेगी।

मैंने कई लोगों को देखा है, जो अपनी जिंदगी से परेशान दिखते हैं। वे सोचते हैं कि कोई बुरी बात उन्हीं के साथ ही क्यों हुई। मुझे लगता है कि ऐसी सोच ही उनके अंदर नकारात्मकता का प्रसार करती है। जरूरत है तो बस इसी सोच को बदलने की।

-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें