इस घटना ने दिव्यांगता के प्रति मेरा नजरिया बदल दिया। प्रतियोगिता के बाद मुझे आवेदन करने पर नागपुर, समाज कल्याण विभाग से एक तिपहिया साइकिल भेंट की गई। साइकिल मिलने के बाद मैं उससे नागपुर घूमने गया। मुझे लगने लगा कि मैं भी कुछ कर सकता हूं। चूंकि पापा से सीधे इस बारे में बात करने की हिम्मत नहीं हो रही थी, तो मैंने जेब खर्च के लिए मिलने वाले पैसे बचाने शुरू कर दिए। कुछ ही महीने में मैंने करीब दो सौ रुपये इकट्ठा कर लिए।
इसके बाद मैं डिटर्जेंट पाउडर बनाने की योजना के तहत नागपुर जाकर सारा सामान ले आया। तब तक घर में किसी को पता नहीं था कि मैं क्या करने वाला हूं। मैंने डिटर्जेंट साबुन बनाकर अपनी तिपहिया साइकिल से तीस से पैंतीस किलोमीटर के क्षेत्र में घर-घर बेचना शुरू किया। जब ग्राहकों की प्रतिक्रिया अच्छी मिली तो एक कंपनी रजिस्टर्ड करवाकर बीस हजार का कर्ज लिया और फैक्टरी खोली, जिसमें सैकड़ों लोगों को रोजगार मिला हुआ था।
लेकिन दुर्भाग्यवश मेरी फैक्टरी में आग लग गई, जिसके चलते भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। चूंकि कंपनी के बीमा का नवीनीकरण नहीं हो पाया था, ऐसे में नुकसान की भरपाई भी नहीं मिली। पर मैं निराश नहीं हुआ। मेरे मन में कुछ ऐसा करने का विचार चल रहा था, जो कि पर्यावरण के लिए भी फायदेमंद हो। इसके लिए मैंने नया उद्योग शुरू किया। इसमें औद्योगिक, ऑटोमोबाइल, ट्रांसफार्मर में उपयोग हो चुके तेल को संशोधन व पुनर्चक्रण के द्वारा दोबारा उपयोग करने लायक बनाया जाता है।
अब जब मेरे शरीर की दिव्यांगता कम होने के बजाय बढ़ रही है, मैं एक सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा ज्यादा काम करता हूं। मैं कुछ सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर दिव्यांगजनों को रोजगार दिलाने वाले प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करवाता हूं। इसके बाद उन्हें रोजगार दिलाने की व्यवस्था करता हूं। मेरा लक्ष्य है कि दिव्यांग किसी पर आश्रित होने के बजाय अपने पैरों पर खड़े हों। वे अपने को कमजोर न समझें, बल्कि काबिल बनें।