हम दोनों ने मिलकर एक बड़ा जोखिम उठाया और नौकरी छोड़कर सिर्फ दो लाख रुपये से अपना स्टार्टअप शुरू किया। ऑनलाइन किताबें बेचने की योजना लिए हमने बंगलूरू में एक फ्लैट किराये पर लिया। संसाधन के नाम पर हमारे पास मात्र दो कंप्यूटर थे।
शुरुआती दस दिनों में हमारी वेबसाइट पर किसी भी किताब का ऑर्डर नहीं आया। आंध्र प्रदेश के एक ग्राहक ने हमें कंप्यूटर से जुड़ी एक किताब का पहला ऑर्डर दिया। यही नहीं, पहले साल हमें बमुश्किल कुल बीस ऑर्डर मिले। किसी ने भी हमें गंभीरता से नहीं लिया। वैसे तो हम भारत में ई-कॉम के भविष्य को लेकर आश्वस्त थे, पर अपनी शुरुआती विफलता से थोड़ा जरूर हिचकिचाए।
खास है भारतीय बाजार
फ्लिपकार्ट के नाम को भारत में ऑनलाइन शॉपिंग का पर्याय बनाने के लिए मैंने लगातार मेहनत की, जिसमें खुद स्कूटर से सामान की डिलीवरी करना भी शामिल है। नए उद्यमियों को मेरी यही सलाह है कि अपना काम तब तक चुका हुआ न मानें, जब तक आपके उत्पाद या सेवाओं के लिए आपका ग्राहक अपना बटुआ सहर्ष खोलने को तैयार न हो जाए।
भारतीय बाजार में काम कर रही किसी भी भारतीय कंपनी के बारे में एक रोमांचक बात यह है कि वह ग्राहकों तक उनके परिजनों से भावनात्मक रिश्तों के आधार पर अपने उत्पाद पहुंचा सकती है। मैं समझता हूं कि भारत में प्रत्येक उद्यमी को यह तरीका अपनाना चाहिए।
-हाल में जानी-मानी ई-कॉम कंपनी फ्लिपकार्ट से रिश्ता तोड़ने वाले कंपनी के सह-संस्थापक के साक्षात्कारों पर आधारित।