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तकनीक के जुनून से बनाई 'क्राउड काउंटिंग मैट', भीड़ का रियल टाइम डाटा निकालना हुआ आसान

Wed, 28 Mar 2018 03:32 PM IST
निलय कुलकर्णी
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Nilay Kulkarni
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मैं नासिक में रहने वाला एक किशोर हूं। बचपन से ही मैं काफी जिज्ञासु रहा हूं। मैं हमेशा से यही चाहता था कि कुछ नया बनाऊं। लेकिन मुझे किसी भी प्रयोग के लिए हार्डवेयर पार्ट्स की जरूरत पड़ती और उसके लिए चाहिए होते थे पैसे। एकाध प्रयोग के बाद मैंने हार्डवेयर से जुड़े प्रयोग करने बंद करके कंप्यूटर प्रोग्रामिंग पर ध्यान केंद्रित करना शुरू किया। अपनी इसी फितरत के कारण चाय की चुस्कियां लेते हुए मैं घंटों लैपटॉप के सामने बैठा रहता था। मैं किसी संभावित खोज की आभासी दुनिया में खुश रहने लगा।

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चौदह वर्ष की उम्र से ही मैंने सॉफ्टवेयर विकसित करने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया था। इस बीच पांच साल पहले 2013 में आयोजित महाकुंभ में तीन दर्जन से ज्यादा लोगों की भगदड़ के कारण मौत हो गई थी। इस खबर से मुझे गहरा दुख पहुंचा। मैं चाह रहा था कि भविष्य में इस प्रकार की दुर्घटनाएं न हों, इसके लिए मैं अपनी तकनीकी दिलचस्पी से कुछ योगदान करूं।

मेरा काम जारी ही था कि 2015 में होने वाले नासिक कुंभ के लिए शहर में एक मीडिया लैब कंपनी द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भागीदारी करने का मुझे मौका मिला। नासिक कुंभ को सफल बनाने के लिए विभिन्न विचारों पर चर्चा करना इस कार्यक्रम का उद्देश्य था। मैंने उस कार्यक्रम में कुंभ के दौरान जुटने वाली भीड़ की सुरक्षा से जुड़ी समस्या पर जोर दिया। वहां मेरी मुलाकात एक ऐसी टीम से हुई, जो मेरे जैसा ही काम कर रही थी। मैं उस टीम के साथ हो लिया। हमने पूर्व में आयोजित हुए कुंभ में जुटी भीड़ से जुड़े तमाम आंकड़े इकट्ठा किए, जिससे भगदड़ का कारण समझने में आसानी हुई।

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चटाई (आशियोटो) अपने मकसद पर बिल्कुल खरी उतरी

भविष्य में भगदड़ न हो, इसके लिए कोई समाधान ईजाद करना हमारा अगला चरण था। अपने अध्ययन में हमने पाया कि कुंभ जैसे विशाल आयोजन में भीड़ का अनुमान न लगा पाना दुर्घटना का एक बड़ा कारक है। शोध का एक पहलू यह भी रहा कि हमें पूर्व के आयोजनों से यह मालूम हो गया कि कहां ज्यादा भीड़ इकट्ठा होती है और कहां कम।

इसका हासिल यह हुआ कि हम प्रशासन को बताने में सक्षम हुए कि किस जगह की भीड़ नियंत्रित करने की आवश्यकता ज्यादा है। इसके अलावा लोगों की सही गिनती कर पाना भी प्रशासन के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। और इसी बात को ध्यान में रखकर मैंने अपना दिमाग चलाना शुरू किया। अपने साथियों की मदद से मैंने बहुत जल्द एक 'क्राउड काउंटिंग मैट' (चटाई) बनाई, जो पदचिन्हों के आधार पर लोगों की गिनती कर पाने में सक्षम थी। तकनीक की वजह से इसे बनाने में बहुत खर्च भी नहीं आया।

हमने ट्रायल के लिए इसका इस्तेमाल एक स्थानीय मंदिर में किया। इस अनूठी चटाई (आशियोटो) के सफल प्रयोग के बाद स्थानीय प्राधिकरणों से जुड़े अधिकारी गोदावरी नदी में होने वाले शाही स्नान के दौरान इसका उपयोग करने के लिए सहमत हो गए। ब्लूटूथ संचार तकनीक से संचालित होने वाली यह चटाई अपने मकसद पर बिल्कुल खरी उतरी। मैंने अपनी टीम के साथ मिलकर एक ऐप भी विकसित किया, जिसकी मदद से अधिकारियों को भीड़ का रियल टाइम डाटा मिलता रहे। यह मैट किसी भी बड़े आयोजन में काम आ सकती है। मेरे अब तक के सफर ने मुझे काफी कुछ सिखा दिया है। मैं उम्मीद करता हूं कि आगे भी मैं समाज के काम आता रहूंगा।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।
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