मेरा जन्म अमेरिका के दक्षिण कैरोलिना में 20 जनवरी, 1972 को एक सिख परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता मूल रूप से अमृतसर से ताल्लुक रखते हैं। मेरे पिता पंजाब कृषि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर थे, जबकि मां ने भी उच्च कानूनी शिक्षा हासिल की थी। पिता को एक कनाडाई विश्वविद्यालय से वजीफा मिलने के कारण मेरे मां-बाप पहले कनाडा, फिर अमेरिका में आकर बस गए। पिता की तरह मेरी मां भी कई वर्षों तक अध्यापन के क्षेत्र में ही रही, जब तक उन्होंने एक कपड़े की दुकान नहीं खोल ली, जो कि आगे चलकर एक बड़ी कंपनी के रूप में तब्दील हो गई।
हुई भेदभाव की शिकार
जब मैं पांच साल की थी, मेरे अभिभावकों ने मेरा और मेरी बहन का नामांकन 'मिस बैंबर्ग' (मेरे स्कूल की सालाना प्रतियोगिता) के लिए कराया, जो कि श्वेत और अश्वेत, दोनों श्रेणियों में आयोजित की जाती थी। लेकिन जजों ने हम दोनों को किसी भी श्रेणी के काबिल नहीं पाया और हमें प्रतियोगिता के लिए अयोग्य घोषित कर दिया। बचपन में मेरी मां ने मेरी परवरिश की जिम्मेदारी जिन्हें दी थी, उनका व्यवहार मेरे प्रति बहुत बुरा रहा है।
दो नस्लों के बीच
बचपन में जब मैं किकबॉल खेलना चाहती थी, दूसरे बच्चे मेरे साथ खेलना नहीं चाहते थे। दरअसल उन बच्चों के बीच बहस यह थी कि मैं श्वेत हूं या अश्वेत। बाल्यकाल से युवावस्था तक ऐसे कई वाकयों से मेरा पाला पड़ा है। श्वेत और अश्वेत, दोनों वर्गों के नस्लभेदियों ने मुझे तिरस्कृत करने का प्रयास किया। लेकिन मुझे इस तथ्य पर भी गर्व है कि तमाम राजनीतिक भेदभावों के बावजूद अड़तीस वर्ष की उम्र में मुझे अपने राज्य में गवर्नर चुना गया।
किए हैं अलग-अलग काम
अपने करियर में मैंने अब तक जो भी प्रयास किए हैं, उनमें मुझे सफलता हाथ लगी है। मैंने कम उम्र में ही दुकान में हाथ बंटाकर अपनी मां की मदद करना शुरू कर दी थी। घरेलू व्यापार में उतरने से पहले मैंने एक अपशिष्ट प्रबंधन और रीसाइकिलिंग कंपनी में काम किया। उसके बाद मैं 1998 में ऑरेंजबर्ग कंट्री चैंबर्स ऑफ कॉमर्स के निदेशक मंडल में शामिल हुई। लेखा-जोखा की दुनिया के इतर मैंने 2004 में राजनीति में हाथ आजमाया। साथ ही मैं 2006 में फ्रेंड ऑफ स्कौटिंग लीडरशिप डिविजन चैंपियन की अध्यक्ष और लेक्सिंगटन में रोटरी क्लब की सदस्य रह चुकी हूं।
भारतीय होने पर गर्व है
खुद को भारत से जोड़ना मेरे लिए हमेशा गर्व का विषय रहता है। अमेरिका में रहने के बावजूद मैं भारतीय परिवेश में पली-बढ़ी हूं, इसलिए भारतीयता मेरी जड़ों में है। मेरे मां-बाप भारत के अपने किस्से सुनाते रहते थे, जिस कारण भारत के प्रति मेरी दिलचस्पी कभी कम नहीं हुई। मुझे भारतीय खाना बहुत पसंद है। यही सारे गुण मेरे बच्चों के भीतर भी है और उनकी अपने दादा-दादी से काफी पटती है। ईसाई धर्म अपनाने के बावजूद सिख धर्म के प्रति मेरे मन में अपार सम्मान है।
-संयुक्त राष्ट्र में तैनात भारतवंशी अमेरिकी राजदूत के साक्षात्कारों पर आधारित।