फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मंजिलें और भी हैंः एचआईवी से संघर्ष कर रहा हूं, ताकि दूसरे सुरक्षित रहें

Wed, 23 Oct 2019 07:12 AM IST
संजीव कुमार झा मोयज्जम हुसैन
विज्ञापन
मोयज्जम हुसैन - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

जब मुझे इस रोग के बारे में पता चला, तब तक काफी देर हो चुकी थी। लेकिन मैंने हार नहीं मानी, क्योंकि मैंने ठान लिया था कि एचआईवी मेरे जीवन की दिशा नहीं तय कर सकता। मूलत: मैं पश्चिम बंगाल का रहने वाला हूं। यह वर्ष 2002 की बात है। मेरी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी। रोजमर्रा काम करने के बाद रोटी का जुगाड़ कर पाता था। मेरे कुछ परिचित कुवैत में रहते हैं। उन लोगों ने मुझे कुवैत जाकर रोजगार तलाशने की सलाह दी।

विज्ञापन


परिचितों ने आर्थिक मदद की, तो मैं कुवैत जाने का टिकट बनवाने के लिए वीजा और पासपोर्ट के साथ मुंबई पहुंच गया। वहां स्वास्थ्य जांच के लिए मेरा रक्त सैंपल लिया गया। थोड़ी देर बाद अधिकारी वापस आए, उन्होंने मुझे बताया कि मैं कुवैत नहीं जा सकता। मेरे फार्म पर लाल रंग की एक मुहर लगी थी, जिसमें 'एचआईवी पॉजिटिव'लिखा हुआ था। इससे पहले मैंने यह शब्द कभी नहीं सुना था। मैंने उनसे पूछा कि इसका मतलब क्या होता है। उन्होंने कहा कि मुझे डॉक्टर से बेहतर सलाह लेनी चाहिए। एक नए शहर में मैं अपने रोग के बारे में और भी जानने के लिए बिल्कुल अकेला घूम रहा था। मैं एक क्लिनिक में गया और डॉक्टर को रिपोर्ट दिखाई। रिपोर्ट देखते ही वह एक मिनट के लिए खामोश हो गया।

उसने भी मुझे घर जाने और जिंदगी के बाकी दिनों का आनंद लेने के लिए कहा, क्योंकि इसका कोई इलाज नहीं था। मुझे लगा कि रिपोर्ट देखकर शायद कोई यह नहीं बताएगा कि 'एचआईवी' क्या है। इसलिए, जब वह अगले डॉक्टर से मैं मिलने गया, तो रिपोर्ट दिखाने के बजाय सीधे एचआईवी के बारे में पूछा। उस डॉक्टर ने मुझे बताया कि एचआईवी अपरिवर्तनीय बीमारी है, और इसका इलाज बेहद मुश्किल है। एक दिन सड़क पर घूमते हुए मुझे एक पोस्टर दिखाई दिया, जिस पर लिखा था एचआईवी और एड्स का हर्बल इलाज। मैं तुरंत वहां गया। वहां एक बूढ़े बाबा कई लोगों से घिरे थे। मैंने उन्हें बताया कि मुझे एचआईवी है, तो उसने कहा कि वह मुझे ठीक कर देंगे। वहां मुझे आयुर्वेदिक दवा की एक बोतल दी गई और छह महीनों तक उसे पीने के लिए कहा गया। मैं इलाज कराने के लिए मुंबई में ही रहने लगा।
विज्ञापन


इस तरह तकरीबन नौ महीने बीत गए और कुछ नहीं हुआ। इसके बाद यह बात मैंने अपने एक दोस्त को बताई। वह मुझे लेकर एक अस्पताल गया, जहां मुझे कुछ दवाइयां दी गईं। लेकिन मैं संतुष्ट नहीं हुआ, तो वापस घर चला आया। घर वापस आने पर हर कोई उदास था, लेकिन किसी ने भी इसके बारे में बात नहीं की। मेरे खाने पीने के बर्तन अलग थे। इस बीच मैं एक एनजीओ के संपर्क में आया, तो कुछ उम्मीद दिखाई दी। मैंने अन्य पीड़ितों के साथ एक नेटवर्क बनाया ताकि हम लोग एक-दूसरे से मिल सकें और इस बीमारी से बचने के समाधान पर चर्चा कर सकें।

हम उन लोगों के संपर्क में रहने लगे, जिन्हें हम जानते थे कि वे सकारात्मक थे। इस बीच, मेरा सीडी4 काफी कम हुआ, तो मैंने दवाएं लेनी शुरू की। इसके दुष्प्रभाव भयानक थे, यह तकरीबन एक साल से अधिक समय तक जारी रहा। लेकिन मैंने कभी भी लोगों के बीच जागरूकता फैलाना बंद नहीं किया। इसके बाद जब राज्य के स्वास्थ्य विभाग ने 2008 में एचआईवी उन्मूलन के लिए एक परियोजना का प्रस्ताव रखा, तो हम एक एनजीओ साथी के माध्यम से उसके संपर्क में आ गए। उन्होंने हमें नेतृत्व और संगठनात्मक विकास का प्रशिक्षण दिया। अब मैं तकरीबन ठीक हो चुका हूं। प्रशिक्षण व जागरूकता मेरे जीवन का अहम हिस्सा बन चुके हैं। मैं पीड़ितों को जहां सकारात्मक रहना सिखाता हूं, वहीं  विश्वास दिलाता हूं कि यह एक बीमारी है, जो इलाज होने पर ठीक हो सकती है।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें