गरीबी के बीच बड़ी कामयाबी
ऊंचागांव ब्लॉक के रघुनाथपुर गांव के रहने वाले पवन की कहानी संघर्ष की मिसाल है। उनके पिता मुकेश कुमार बताते हैं कि परिवार के पास केवल चार बीघा जमीन है और पक्का घर तक नहीं। एक ईंटों का कमरा और छप्पर का टपकता मकान ही उनका आशियाना है। बारिश के दिनों में जब दीवारें और छत से पानी टपकता, तब भी पवन किताबें लेकर बैठ जाता। पिता कहते हैं, “वह हमेशा कहता था बस थोड़ा वक्त दे दो पापा, सब बदल दूंगा।”
पिता चाहते थे सेना में जाए बेटा, लेकिन पवन का सपना अलग था
2017 में इंटर पास करने के बाद पिता चाहते थे कि पवन नौकरी या सेना की तैयारी करे, लेकिन पवन का लक्ष्य सिविल सेवा था। पिता ने बेटे का हौसला बढ़ाया और कहा, “जो चाहो करो, हम सब साथ हैं।”
4% कर्ज लेकर पढ़ाया, रिजल्ट आने के अगले दिन भी मजदूरी पर गया पूरा परिवार
परिवार ने 4% ब्याज पर उधार लेकर सेकेंड हैंड मोबाइल और पढ़ाई का खर्च उठाया। खेतों में मजदूरी कर उन्होंने बेटे के सपने को थामा रखा। इसी अटूट विश्वास और साथ की बदौलत बेटा देश की सबसे कठिन परीक्षा में सफल हुआ। पिता बताते हैं कि रिजल्ट आने के अगले दिन भी पूरा परिवार मजदूरी पर गया, क्योंकि बेटे की पढ़ाई के लिए ब्याज पर जो पैसे लिए थे, उन्हें चुकाना अभी भी बाकी था।
मां ने बेचे गहने
पवन की मां सुमन देवी ने बेटे की पढ़ाई के लिए अपने गहने तक बेच दिए। परिवार में पिता, मां और तीन बहनें — गोल्डी, सृष्टि और सोनिका हैं। गोल्डी बीए कर चुकी है, सृष्टि बीए की परीक्षा दे रही है, जबकि सोनिका इंटर की छात्रा है। पवन ने इलाहाबाद से बीए करने के बाद यूपीएससी की तैयारी शुरू की थी।
सिलिंडर तक भरवाने के पैसे नहीं
संघर्ष के दिनों उनकी आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि घर का गैस सिलिंडर तक खाली पड़ा रहता था, मां चूल्हे पर रोटी बनाती थीं। पवन के घर का हैंडपंप खराब होने के कारण वे सरकारी स्कूल के नल से पानी लाते थे। बावजूद इसके, कड़ी मेहनत करके पवन ने सफलता का परचम लहराया।
मेहनत और आत्मविश्वास से मिलती है सफलता
पवन का कहना है कि अगर लगन, आत्मविश्वास और लक्ष्य के प्रति समर्पण हो तो सफलता निश्चित है। असफलता से घबराना नहीं चाहिए, बल्कि उससे सीखकर आगे बढ़ना चाहिए। वह कहते हैं कि इंटरव्यू आत्मविश्वास की परीक्षा होती है। पवन रोज 8–10 घंटे खुद से पढ़ते थे।