किसे पता था कि देश के लिए खेलने का मेरा सपना तो जरूर पूरा होगा, लेकिन फुटबॉल नहीं, बल्कि किसी दूसरे खेल में। मुश्किल से दो साल पहले ही मैंने अपने शरीरिक शिक्षा अध्यापक की सलाह पर फुटबॉल को अलविदा कहकर एथलेटिक्स की व्यक्तिगत स्पर्धा में हाथ आजमाने लगी। मिट्टी के टर्फ पर कुछ महीनों तक अभ्यास करने के बाद मैंने राज्य स्तरीय प्रतियोगिता की सौ मीटर स्पर्धा में न सिर्फ भाग लिया, बल्कि कांस्य पदक भी जीता।
जब गुमनामी में बिखेरी चमक
जब मुझे जूनियर राष्ट्रीय चैंपियनशिप के लिए कोयंबटूर भेजा गया, तो मुझे जानने वाला कोई नहीं था। वहां जब मैंने फाइनल में जगह बनाई, तो किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि
जिस लड़की को अभ्यास करने के लिए सिंथेटिक ट्रैक तक न नसीब हुआ हो, वह ऐसा प्रदर्शन कर सकती है। भले ही मुझे पदक नहीं मिला, मगर जब मैं वापस घर लौटी, मेरी दुनिया
बदल चुकी थी। घरवालों की रजामंदी मिलते ही मेरे कोच निपॉन दास बेहतर ट्रेनिंग के लिए मुझे गुवाहाटी ले आए। मेरे पिता तो इसी बात से संतुष्ट थे कि ट्रेनिंग के बहाने उनकी बेटी
को तीन वक्त अच्छा खाना मिल सकेगा।
पसंद हैं जुबिन दा के गाने
खाली वक्त में मैं प्रसिद्ध असमिया गायक जुबिन गर्ग को सुनना पसंद करती हूं। मैं जुबिन दा को व्यक्तिगत तौर पर भी जानती हूं और उन्होंने मुझे काफी प्रेरित किया है। दो साल पहले
तक एथलेटिक्स से कोई वास्ता न रखने के बावजूद मैंने इसी वर्ष गोल्ड कोस्ट में आयोजित हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। मैं वहां पदक तो नहीं जीत सकी, लेकिन यह उम्मीद जरूर थी कि आज नहीं तो कल, मेरा वक्त जरूर आएगा!
-विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक विजेता के साक्षात्कारों पर आधारित।