बकुलाबेन पटेल का जीवन युवाओं के लिए बड़ी प्रेरणा
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जिन लोगों को किसी चीज से डर (फोबिया) होता है, वे आमतौर पर उससे बचने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं। लेकिन गुजरात के सूरत की रहने वाली बकुलाबेन पटेल की कहानी कुछ अलग है। एक बार तो नदी में तैरते हुए उनकी जान पर बन आई, जिसके बाद उन्होंने दोबारा पानी में न उतरने का फैसला कर लिया। लेकिन कुछ महीनों बाद उन्होंने अपने डर के आगे झुकने के बजाय उसे चुनौती देने का निश्चय किया। 58 वर्ष की उम्र में पानी में दोबारा उतरने का उनका यह फैसला आगे चलकर ऐसी प्रेरक कहानी बना, जिसने उम्र की सीमाओं को चुनौती दी। 80 वर्ष की उम्र में तैराकी की चैंपियन बन चुकीं बकुलाबेन को आखिर किस चीज ने उन्हें पानी में उतरने और अपने डर का सामना करने के लिए प्रेरित किया?
संघर्षों भरा बचपन
गुजरात के सूरत की रहने वाली बकुलाबेन का जीवन शुरुआत से ही आसान नहीं रहा। बचपन में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया, जिससे उनकी पढ़ाई भी प्रभावित हुई। काफी कमियों के साथ रिश्तेदारों के यहां पली-बढ़ी और महज 13 वर्ष की उम्र में उनकी शादी कर दी गई। जिस उम्र में बच्चे अपने सपनों को पहचानना शुरू करते हैं, उस उम्र में बकुलाबेन के कंधों पर पारिवारिक जिम्मेदारियां आ गईं। वह खेलकूद में रुचि रखती थीं, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अवसर नहीं दिया। समय बीतता गया और वह परिवार की जिम्मेदारियां निभाती रहीं। हालांकि, उनके जीवन में एक और कठिन मोड़ तब आया, जब उनके बच्चे छोटे ही थे और उनके पति का निधन हो गया। कम उम्र में उनके सामने न सिर्फ परिवार संभालने की चुनौती थी, बल्कि भावनात्मक अकेलेपन से जूझना भी आसान नहीं था। धीरे-धीरे बच्चों ने अपना जीवन आगे बढ़ाया और वे अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए। इसके बाद बकुलाबेन को अपने जीवन में एक खालीपन महसूस होने लगा। उनके भीतर कुछ नया करने की इच्छा थी, लेकिन उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि शुरुआत कहां से करें।
पोते-पोती से मिली प्रेरणा
बकुलाबेन रोज अपने पोते-पोती को स्कूल छोड़ने और लेने जाया करती थीं। इसी दौरान उन्होंने बच्चों को खेलकूद में हिस्सा लेते देखा। बच्चों के उत्साह ने उनके भीतर भी कुछ नया करने की इच्छा जगा दी और उनका बचपन का सपना फिर से जीवित होने लगा। जीवन में आए इसी खालीपन को भरने के लिए बकुलाबेन ने तैराकी सीखने का फैसला किया, जबकि पानी से उन्हें डर लगता था। उनके लिए यह खेल सीखना नहीं, बल्कि जीवन में नई ऊर्जा भरने की कोशिश थी। लेकिन शुरुआती अनुभव ने जल्द ही उनके हौसले की परीक्षा ली।
14 किमी की दौड़, 11 बार सूर्य नमस्कार
बकुलाबेन रोज सुबह सूर्योदय से पहले ही उठ जाती हैं। इसके बाद वह 14 किलोमीटर दौड़ती हैं और अपने रोजमर्रा के कामों में जुटने से पहले 11 बार सूर्य नमस्कार और शीर्षासन करती हैं। वह दिन में सोती नहीं हैं और शाम का समय अक्सर तापी नदी की गहराइयों में तैरते हुए बिताती हैं। यही वह नदी है, जिसने कभी उनकी जान लगभग ले ही ली थी। आज उसी नदी में तैरना उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
80 की उम्र, 500 पदक
बकुलाबेन ने तैराकी सीखने तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने नियमित अभ्यास जारी रखा और 59 वर्ष की उम्र में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू किया। मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत का प्रतिनिधित्व किया। आज 80 वर्ष से अधिक उम्र में भी वह खेल के प्रति समर्पित हैं। वह 16 से अधिक देशों में तैराकी प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुकी हैं और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 500 से अधिक पदक और ट्रॉफियां जीत चुकी हैं। तैराकी के साथ उन्होंने एथलेटिक्स में भी अपनी सक्रियता बनाए रखी।
भरतनाट्यम से प्यार
उनकी रुचि केवल खेल तक सीमित नहीं है। वह भरतनाट्यम में भी गहरी दिलचस्पी रखती हैं और 75 साल की उम्र में ढाई घंटे स्टेज पर परफॉर्म करके लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी अपना नाम दर्ज करा चुकी हैं। इसके अलावा मैराथन, योग और साइकिलिंग भी करती हैं और वह स्विमिंग सिखाती भी हैं।
युवाओं को सीख
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सपनों को पूरा करने के लिए सही समय का इंतजार न करें, बल्कि आज से ही शुरुआत करें।
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हर मुश्किल हमें कुछ नया सिखाती है और आगे बढ़ने के लिए मजबूत बनाती है।
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चुनौतियों से भागने के बजाय उनका सामना करें, क्योंकि साहस से ही आत्मविश्वास बढ़ता है।