कहते हैं कि अगर हौसलें बुलंद हो तो कोई भी इंसान बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना कर सफलता की ऊचाइंयों को छू ही लेता है। कुछ ऐसी ही कहानी है पश्चिम बंगाल के रहने वाले 'गाजी जलाउद्दीन' की। गाजी अपने क्लास के सबसे होनहार बच्चे थे लेकिन पैसों की कमी ने उन्हें कक्षा 2 तक भी पहुंचने नहीं दिया। छोटी सी उम्र में गाजी को खेल कूद से ज्यादा किताबों से प्यार था लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था।
13 वर्ष की उम्र में गाजी चलाते थे रिक्शा
गाजी जलाउद्दीन
गाजी के पिता पश्चिम बंगाल के सुंदरवन इलाके के ठाकुरचाक गांव में एक किसान थे। उनकी इतनी भी आय नहीं होती थी कि हर रोज परिवार को भरपेट भोजन करा सकें। कई दिन तो गाजी का परिवार सिर्फ पानी पीकर सो जाता था। गाजी के पिता काम की तलाश में गांव छोड़कर कोलकाता शहर पहुंचें पर उन्हें कोई काम नहीं मिला। हालत ऐसी हो गई कि गाजी को छोटी सी उम्र में ही सड़क पर भीख मांगनी पड़ी।
13 वर्ष की उम्र में गाजी ने कोलकाता के इंटाली बाजार में रिक्शा चलाने का काम शुरू किया। पहले वो बाजार में सामान का ठेला खींचते थे। बाद में सवारी वाला रिक्शा भी चलाने लगे। 18 साल की उम्र में गाजी ने ड्राइविंग सीख ली और टैक्सी ड्राइवर बन गए लेकिन उनके दिमाग में यही बात चल रही थी कि गांव के दूसरे बच्चे भी उनकी तरह ही किस्मत के हारे न बन जाएं।
आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों की बात को ध्यान में रखते हुए गाजी ने 'सुंदरवन ड्राइविंग समिति' बनाई जो सुंदरवन के गांव के युवकों को ड्राइविंग सिखाती है ताकि वो अपनी जिंदगी बड़ी आसानी से काट सकें। गाजी ने बताया कि उन्होंने पहले अपनी क्लास में 10 युवकों को मुफ्त में ड्राइविंग सिखाई और उन्हें कहा कि जब वो ड्राइविंग से कमाना शुरू कर दें तो अपनी कमाई से 5 रुपये इस समिति को दान में दे दें।
सिर्फ इतना ही नहीं उन्होंने अपने छात्रों से कहा कि वो गांव के दूसरे युवकों को भी ड्राइविंग सिखाएं। इस सरह से ड्राइविंग स्कूल की चेन चलने लगी। अब उस स्कूल में 300 युवक हैं जो टैक्सी चलाकर पैसे कमा रहे हैं।
1998 में बनाया अपना स्कूल
गाजी जलाउद्दीन
गाजी यहीं नहीं रुके उन्होंने अपने 2 कमरे के छोटे से घर के एक कमरे में स्कूल खोल लिया। इस स्कूल में उन बच्चों को पढ़ाया जाने लगा जिनके माता पिता उन्हें पैसे की कमी के चलते शिक्षा नहीं दे सकते थे। पहले-पहले कोई भी गाजी के पास अपना बच्चा भेजने को तैयार नहीं था क्योंकि उनका कहना था कि पढ़ाकर क्या होगा जब कि पैसे की कमी के चलते उन्हें कभी अच्छी उच्च शिक्षा और नौकरी नहीं मिलेगी। लेकिन इसके बाद भी गाजी ने हार नहीं मानी और स्कूल बनाने का फैसला किया।
साल 1998 में गाजी ने इस्माइल इस्राफिल (गाजी के दोनों बेटों के नाम से) फ्री प्राइमरी स्कूल की स्थापना की। 2 शिक्षक और 22 छात्रों से इस स्कूल की शुरुआत हुई। इसके बाद ड्राइविंग से आने वाली डोनेशन के बल पर गाजी ने साल 2012 तक स्कूल के लिए एक पूरी बिल्डिंग खरीद ली। उस इमारत में 12 कक्षाएं, 2 शौचालय और एक मिड डे मील रूम मौजूद हैं। अब स्कूल में 21 शिक्षक और करीब 450 बच्चे पढ़ते हैं।