इस स्कूल के पास अपनी बिजली, अपना पानी, खाना पकाने के लिए अपना ईधन है। स्कूल की अपनी डेयरी है। यहां तक की फल-सब्जियां और अनाज भी अपना है।
विज्ञापन
दुनिया की भागमभाग से दूर... पेड़, पहाड़ और झरनों के बीच ये स्कूल एकदम सपनों के जैसा है। होमवर्क पूरा न होने पर पनिशमेंट नहीं मिलता। बच्चों के लिए अलग-अलग कक्षाएं नहीं होतीं। छोटो हों या बड़े सब मिलकर पढ़ते हैं। बच्चे दरअसल पढ़ते नहीं, बल्कि सीखते हैं।
यहां सारे बच्चे खुद से ही स्कूल की देखभाल करते हैं। आश्चर्य की बात ये भी है कि स्कूल की हर चीज बच्चों और उनके टीचरों ने ही बनाई है।
यहां ने आगे बढ़ने की आपाधापी है, न पीछे रह जाने की कसक। बेहतर इंसान कैसे बनते हैं, ये यहां का फलसफा है। यही वजह है पुरस्कारों और तमगों से परे इस स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को न तो किसी तरह का डर सताता है और न ही भविष्य की चिंता होती है।
विज्ञापन
बच्चों के सपनों को पंख देने वाला ये स्कूल भारत में ही है, कहां है, कौन इसे चलाता है? अगली स्लाइड में पढ़ें।
एक अंग्रेज ने तमिलनाडु में बनाया सपनों जैसा स्कूल
ब्रायन जेनकिन्स
- फोटो : thehindu
तमिलनाडु की पलानी पहाड़ियों के हरे-भरे मनमोहक इलाके में ये स्कूल है। स्कूल का नाम शोलाई स्कूल रखा गया है। तमिल में शोलाई का अर्थ होता है जंगल। चारों ओर से जगलों और नदी-झीलों और झरनों से घिरा होने के कारण शोलाई स्कूल अपने अपने नाम बखूबी मेल खाता है। क्लोआट यानी सेंटर फॉर लर्मिंग ऑर्गैनिक एग्रीकल्चर एंड एप्रोप्रिएट टेक्नोलॉजी के नाम से भी जाना जाता है।
प्रकृति की गोद में स्थित इस स्कूल को बनाया है ब्रायन जेनकिन्स ने। जेनकिन्स ब्रिटिश मानवविज्ञानी हैं। जेनकिन पहली दफा साल 1969 में भारत आए थे। वे बोधगया में अध्ययन करने आए थे। जेनकिन्स ब्रिटिश कालीन भारत के महान भारतीय विचारक और शिक्षक जे. कृष्णमूर्ति से काफी प्रेरित हुए। जे. कृष्णमूर्ति मानव कल्याण के लिए किए गए अपने उत्कृष्ट कार्यों के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं।
जेनकिन्स ने जे. कृष्णमूर्ति के यूके स्थित ब्रोकवुड पार्क स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया। 14 साल बाद जेनकिन्स ने कुछ अपना करने के इरादे से भारत लौटे। जेनकिन्स ने कोडईकनाल के पास की 100 एकड़ की जमीन पर एक छोटी सी इमारत और रसोईघर से स्कूल बनाया।
स्कूल की कॉफी जर्मनी एक्सपोर्ट होती है
बायोगैस ईधन से 100 फीसदी शुद्ध खाना तैयार होता है
- फोटो : www.sholaicloaat.org
आज स्कूल की सूरत बिलकुल बदल चुकी है। बहुत बड़ा भवन-परिसर है। अवासीय कक्षा ब्लॉक बने हुए हैं। लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग हॉस्टल हैं। खाना खाने की अलग जगह है। पुस्कालय है। स्कूल के फर्नीचर की हर एक चीज यहां के छात्रों ने बनाई है।
दूर तक फैली जमीन पर खेती होते ही और यहीं स्कूल की डेयरी है। खेती जैविक तरीके से होती है। यहां कॉफी की अच्छी किस्म उगाई जाती है। स्कूल की कॉफी को जर्मनी एक्सपोर्ट किया जाता है। कालीमिर्च, एवाकाडो, संतरे और सब्जियां भी उगाई जाती हैं।
स्कूल के अपने चार बायोगैस प्लाइंट हैं। खाना बनाने के लिए इसी ईधन का इस्तेमाल होता है। बायोगैस से बना होने की वजह से कह सकते हैं कि यहां के बच्चे 100 फीसदी शुद्ध खाना खाते हैं क्योंकि खाना पूरी तरह से शाकाहारी ही पकाया जाता है।
स्कूल की डेयरी में न केवल ऑर्गेनिक दूध तैयार होता है बल्कि आर्गैनिक पनीर भी तैयार किया जाता है।
बच्चों को कैंब्रिज में पढ़ने लायक बनाया जाता है
- फोटो : www.sholaicloaat.org
स्कूल में पानी के जरूरतों के लिए नगर निगम की सप्लाई पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, यहां प्राकृतिक स्त्रोतों से पानी को बचाया जाता है और उसका इस्तेमाल किया जाता है। स्कूल में बिजली के लिए भी शहर की ओर नहीं ताकना पड़ता है। फोटोवोल्टिक पैनल और माइक्रो हाइड्रोलिक टरबाइन से स्कूल अपनी बिजली पर ही निर्भर है। स्कूल में जगह -जगह सोलर पैनल लगे हैं ताकि सौर ऊर्जा से बिजली का इस्तेमाल हो सके।
जेनकिन्स बच्चों की श्रेणीबद्ध पढ़ाई में यकीन नहीं रखते। अलग-अलग उम्र और कक्षाओं के बच्चे एक साथ समूह बैठकर पढ़ाई का लुत्फ लेते हैं। बच्चों को इस लायक बनाया जाता है कि वो आगे चलकर कैंब्रिज सरीखे विश्वविध्यालयों में दाखिला पा सकें। ये है जेनकिन्स के प्रयासों की सक्सेस स्टोरी।
जैनकिन्स की तरह आप भी कल के भविष्य को ऐसा माहौल देकर सशक्त बना सकते हैं और मानवकल्याण में योगदान दे सकते हैं।
स्कूल की अपनी वेबसाइट www.sholaicloaat.org है। वेबसाइट पर जाकर आप इनसे संपर्क भी कर सकते हैं। ये लोग इच्छुक और योग्य कैंडिडेट को नौकरी भी देते हैं।