इसके लिए मैंने कौशल्या फाउंडेशन की शुरुआत की, जिसके तहत किसानों को विभिन्न किस्म की फसलें उगाने के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया। उनके लिए कार्यशालाएं लगवाईं, साथ ही खेती से संबंधित जो भी मदद उन्हें चाहिए थी, मुहैया करवाई। इसके बाद एक कमर्शियल कंपनी शुरू की, जो उनकी फसल खरीदकर लागत के हिसाब से सही दाम देने लगी। मैं केवल कृषि क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्तर पर भी उनके जीवन में सुधार लाने की कोशिश कर रहा हूं।
मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं है कि कितने किसान मेरे साथ जुड़े हुए हैं। मतलब सिर्फ इससे है कि जो भी किसान हमारे साथ जुड़े हुए हैं, उनकी जिंदगी में हमारी मदद से कोई बदलाव आ रहा है या नहीं। शुरुआत में जब मैंने किसानों से मिलना शुरू किया और उन्हें अलग-अलग तकनीक का इस्तेमाल करके खेती करने के सुझाव दिए, तो बहुत कम लोगों ने मेरी बातों पर ध्यान दिया। दो तीन किसान आगे आए, जिनसे पहले दिन भिंडी, मटर, फूलगोभी खरीदकर बेचने पटना पहुंचा। सब्जी खरीदी कितने की थी यह मुझे याद नहीं है पर 22 रुपये की बिक्री हुई, यह मेरे लिए खुशी की बात थी।
हालांकि महीनों की दिन-रात की मेहनत के बाद अब किसान मुझ पर भरोसा करने लगे हैं। गांधी जी के सामुदायिक उत्थान और ग्राम स्वराज जैसे सिद्धांतों से मिली प्रेरणा के चलते मेरी कोशिश रहती है कि, जहां भी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित हों, वहां पर एक समूह बन जाए। इसी सोच के चलते किसान उत्पादक संगठन बनावाने लगा, जिससे करीब हजारों की संख्या में किसान जुड़ रहे हैं।
आज इन कामों से लगभग 35,000 किसान परिवारों को फायदा मिल रहा है। मेरी कोशिश है कि हर किसान की मासिक आय कम से कम इतनी हो सके कि वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेज सके। महात्मा गांधी ने कहा है कि, जो बदलाव हम दूसरों में देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत हमें खुद से करनी होगी। देश में कृषि का स्तर ऊंचा उठाने के लिए किसानों को आगे आना होगा और हर वह कोशिश करनी होगी, जिससे बदलाव हो सके।