साल 1998, चेन्नई का संतोषपुरम इलाका, सड़क के आवारा कुत्ते स्थानीय लोगों की क्रूरता का शिकार हो रहे थे। उनकी बढ़ती तादात की वजह वे बेरहमी से मारे जाने लगे। उन्हें स्थानीय लोगों का कोप झेलना पढ़ता या नगर निगम वाले उन्हें मार देते। ये देख सी. पदमावती और उनके पति नरसिम्मामूर्ति का दिल पसीज गया।
बेजुबान जानवरों की हत्या मंजूर नहीं थी। उन्हें लगा कि भगवान की बनाई दुनिया में जानवरों का भी उतना ही हक है जितना इंसानों का। उन्हें भी ममता, दुलार और स्नेह की जरूरत है। बस फिर क्या था, दिल से आई आवाज को सुना और बेजुबान जानवरों के उद्धार के लिए एनीमल वेलफेयर एंड प्रोटेक्शन ट्रस्ट की नींव रख दी।
तब से वेलीचेरा-तंबारम मुख्यमार्ग स्थित ये ट्रस्ट सैकड़ों कुत्तों, बिल्लियों समेत तमाम अवारा और हिंसा का शिकार हुए जानवरों के लिए जीवनदायनी जगह बन गया।
दबेटरइंडियाडॉटकॉम की खबर के मुताबिक पदमावति और नरसिम्मा ने ट्रस्ट तो शुरू कर दिया लेकिन सबसे बड़ी चुनौती ये भी थी कि जानवरों बढ़ती आबादी को कैसे नियंत्रित किया जाए। लेकिन इस दंपति की कल्याणकारी सोच, जज्बा, हिम्मत और संकल्प ने लक्ष्य को हकीकत में बदल दिया।
तीन डॉक्टर और आठ अटेंडेंट हर वक्त रहते हैं मौजूद
एनीमल बर्थ कंट्रोल की मिसाल कायम की
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इस दंपति ने एनीमल बर्थ कंट्रोल की अनोखी मिसाल कायम की। ट्रस्ट की ओर से जानवरों का अस्पताल बनाया गया। उनके लिए रहने लायक आश्रय स्थल तैयार हुआ। डॉक्टरों की टीम नियुक्त की गई। मौजूदा वक्त में तीन योग्य डॉक्टर और आठ अंटेंडेंट की टीम हर वक्त बेजुबानों की सेवा में तत्पर रहती है। ये टीम बीमार और घायल जानवरों का इलाज करती है और जरूरत पड़ने पर बर्थ कंट्रोल सर्जरी करती है।
वर्तमान में 85 आवारा कुत्ते, 42 पिल्ले, 11 नवजात बिल्ली के बच्चे, 35 बल्लियां इनकी देखभाल में रहते हैं। जानवरों के छोटे बच्चों को बुजुर्ग दंपति अपने घर में रखते हैं जबकि बाकी जानवरों को आश्रय स्थल पर रखा जाता है।
शुरुआत में ट्रस्ट ने पांच पंचायतों के अंतर्गत आने वाले इलाके में जानवरों की बर्थ कंट्रोल सर्जरी की सेवा मुहैया कराई, लेकिन अब ये दायरा 25 पंचायतों तक पहुंचा गया है। ट्रस्ट की ओर से जानवरों को रेबीज से बचाने के लिए मुफ्त वैक्सीनेशन कैंप लगाया जाता है। रेबीज एक बड़ी वजह है कि लोग इन जानवरों से दूर रहना पसंद करते हैं।
कुत्तों और बिल्लियों के अलावा इस ट्रस्ट ने सियार, खरगोश, बंदर और चिड़ियों को भी बचाने में भूमिका निभाई है।
और ज्यादा जानवरों की जिम्मेदारी उठाने को तैयार है ट्रस्ट
आप भी बंटा सकते हैं नेक काम में हाथ
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चंद दिनों पहले 13 साल के छात्र को एक नवजात पिल्ला सड़क पर कराहते हुए मिला। उसका एक पंजा कुचला हुआ था। वो सीधे उसे पदमावति के पास ले आया। पदमावति ने दो महीने उसकी ऐसी सेवा कि पिल्ला सरपट दौड़ने लगा। इसका श्रेय पदमावति उस लड़के की दुआओं और भगवान के आशीर्वाद को देती हैं।
इस ट्रस्ट के जरिए लोग घर के लिए पालतु कुत्तों, पिल्लों और बिल्लियों को ले जा सकते हैं। यहीं नहीं, अगर कोई इन जानवरों की देखभाल के लिए अनुदान करना चाहे तो कर सकता है और वॉलिंटियर की भूमिका भी निभा सकता है।
पदमावति कहती हैं कि उनके यहां जानवरों को पूरी तरह महफूज रखा जाता है। उन्हें कीड़ों और कीटाणुओं से बचाकर साफ-सुथरा किया जाता है। उन्हें जरूरत की टॉनिक और दवाईयां दी जाती हैं जिससे कि अगर कोई उन्हें ले जाए तो जानवरों के साथ आने वाली बीमारियों से महफूज रहे।
ट्रस्ट और भी ज्यादा जानवरों की जिम्मेदारी उठाने को तैयार है अगर लोग इस काम में हाथ बंटाने को तैयार रहे। इनकी सेवा में अनुदान या किसी भी तरह से मदद करने के लिए awptrust@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।
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