पर धीरे-धीरे लोगों को समझ में आने लगा कि रंगभूमि एक अलग तरीके की शैली है, जो सही मायने में जीने का मकसद सिखाती है। इसके जरिये मेरी कोशिश युवाओं को थियेटर से जोड़कर रोजगार के नए मौके दिलाना है। मुंबई, पुणे और दूसरे कई शहरों के स्कूल और कॉरपोरेट सेक्टर में यह युवाओं और महिलाओं को जोड़ने का काम करती है। इसके जरिये जहां युवाओं में छिपी कला को निखारा जाता है, वहीं महिलाओं में भरोसा पैदा किया जाता है कि उनके पास भी पुरुषों की तरह बड़े फैसले लेने का अधिकार है।
इसमें हम कविता की शैली में थियेटर करते हैं। आमतौर पर थियेटर में जो भी होता है, वह स्क्रिप्ट पर आधारित होता है, जबकि रंगभूमि में हम सीधे दर्शकों को साथ में जोड़ते हैं। इस समय मैं मुंबई के अलावा पुणे, बंगलूरू और हैदराबाद के स्कूलों के साथ काम कर रही हूं। इसमें स्कूली पाठ्यक्रम के साथ थियेटर भी सिखाया जाता है। इसका पाठ्यक्रम कक्षा एक से 12वीं तक के बच्चों के लिए डिजाइन किया गया है। कक्षा के हिसाब से बच्चों को थियेटर की अलग-अलग शैली सिखाई जाती है।
हम समय-समय पर समाज में जागरूकता लाने के उद्देश्य से कैंसर अस्पताल, झुग्गी बस्तियों, जेल और अनाथाश्रमों में भी प्रस्तुति देते हैं, जिसमें ग्रुप के साथ स्कूली बच्चे भी शामिल होते हैं। हमारा मकसद किरदारों को रोजमर्रा के जीवन से उठाकर उसे स्टेज पर प्रस्तुत करना है। यही वजह है कि मैं इसे थियेटर कहने के बजाय ड्रामा फॉर लर्निग ऐंड रिफ्लेक्शन ऑफ लाइट कहती हूं। मैं अपने काम से बहुत खुश हूं, क्योंकि हम बहुत कम थियेटर संस्थाओं में से एक हैं। जो काम हम कर रहे हैं, वह मुझे इससे आगे तक जाने के लिए प्रेरित करता है।
-विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।