बच्चों के रहने के लिए मेरे एक दोस्त ने अपना घर दिया, जो तब खाली था। मैंने वहां उनके रहने की व्यवस्था की। शुरुआती दौर में आर्थिक मजबूती न होने के कारण मुझे करीब आठ महीने तक अपनी कंपनी में रात को भी काम करना पड़ा, ताकि कुछ धन इकट्ठा हो सके। धीरे-धीरे जब कुछ लोगों को मेरी योजना के बारे में पता चला, तो उन्होंने मदद के लिए हाथ बढ़ाया। वर्ष 2016 में मैंने नौकरी छोड़कर अपना पूरा वक्त ‘स्नेहवन’ को देने का फैसला किया।
इसके बाद मैंने आसपास के छह जिलों से ऐसे बच्चों के बारे में पता किया, जिनके किसान पिता ने आत्महत्या कर ली थी। ये बच्चे स्नेहवन में रहने लगे। इनके रहने, खाने और पढ़ाई का पूरा खर्च मैं उठाता हूं। सभी बच्चे पुणे के ‘समता प्राथमिक माध्यमिक विद्यालय’ में पढ़ते हैं। इन बच्चों की नौकरी लगने तक की पूरी जिम्मेदारी मैंने अपने कंधों पर ली है। जब मैंने इस संगठन को शुरू किया था, तो पहले इसमें सिर्फ आत्महत्या करने वाले किसानों के बच्चों को ही लेने का फैसला लिया, लेकिन लोगों के सुझाव पर मैंने अब कर्ज में डूबे किसानों के बच्चों को भी इसमें लेना शुरू कर दिया है।
इन बच्चों को स्कूली पढ़ाई के अलावा कंप्यूटर, तबला, हारमोनियम, शास्त्रीय संगीत, पेंटिंग के साथ योग की भी ट्रेनिंग दी जाती है। इसके लिए मेरे साथ आठ स्वयंसेवक और शिक्षक हैं, जो इन बच्चों के लिए समय निकालकर आते हैं। बच्चे बेहतर तरीके से पढ़ाई कर सकें, इसके लिए ‘स्नेहवन’ में एक लाइब्रेरी भी बनाई गई है, जहां पर हिंदी, अंग्रेजी और मराठी की किताबें मौजूद हैं। मैं इन बच्चों के व्यक्तित्व विकास पर ध्यान देता हूं। जब मैंने इस काम के लिए नौकरी छोड़ी, तो मेरे माता-पिता ने इसका विरोध किया, लेकिन जब उनको भरोसा हुआ कि मेरा फैसला सही है, तो वे भी इन बच्चों की देखभाल के लिए पुणे आ गए।
(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)